
महादेव
महादेव
कथा के अनुसार जब गंगा स्वर्ग से उतरने लगीं तो उनका वेग इतना तेज था कि धरती उसे सह नहीं पाती। भागीरथ की प्रार्थना पर शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और फिर धीरे धीरे छोड़ा। इसका संकेत यह माना जाता है कि शिव प्रचंड शक्ति को संभालने की क्षमता रखते हैं।
शिव जी को चंद्रशेखर भी कहा जाता है। चंद्रमा मन का कारक माना जाता है और शिव के मस्तक पर उसका होना मन पर नियंत्रण का प्रतीक समझा जाता है। एक मान्यता यह भी है कि दक्ष के शाप से क्षीण होते चंद्रमा को शिव जी ने आश्रय दिया था।
मंत्र
ॐ नमः शिवाय
मैं शिव को नमस्कार करता हूँ, जो आत्म-स्वरूप में परम शांत हैं।
भगवान शिव का स्वरूप और उसके प्रतीकों का अर्थ
जटाओं में गंगा
कथा के अनुसार जब गंगा स्वर्ग से उतरने लगीं तो उनका वेग इतना तेज था कि धरती उसे सह नहीं पाती। भागीरथ की प्रार्थना पर शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और फिर धीरे धीरे छोड़ा। इसका संकेत यह माना जाता है कि शिव प्रचंड शक्ति को संभालने की क्षमता रखते हैं।
मस्तक पर चंद्रमा
शिव जी को चंद्रशेखर भी कहा जाता है। चंद्रमा मन का कारक माना जाता है और शिव के मस्तक पर उसका होना मन पर नियंत्रण का प्रतीक समझा जाता है। एक मान्यता यह भी है कि दक्ष के शाप से क्षीण होते चंद्रमा को शिव जी ने आश्रय दिया था।
तीसरा नेत्र
यह नेत्र ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। कथा है कि कामदेव ने जब शिव जी की तपस्या भंग करनी चाही तो तीसरे नेत्र की अग्नि से वे भस्म हो गए।
गले में सर्प और शरीर पर भस्म
सर्प भय पर विजय का संकेत है। भस्म याद दिलाती है कि सब कुछ अंत में राख हो जाना है, इसलिए मोह बेकार है।
डमरू और त्रिशूल
डमरू की ध्वनि को सृष्टि के आदि नाद से जोड़ा जाता है। त्रिशूल की तीन नोकों को सत्व, रज और तम गुणों या सृष्टि, पालन और संहार से जोड़कर समझा जाता है। अलग अलग परंपराएं अलग अर्थ बताती हैं।
नीलकंठ कैसे बने
समुद्र मंथन से अमृत से पहले हलाहल विष निकला। उसकी तपन से सब जीव व्याकुल हो गए। देवता और असुर दोनों शिव जी के पास पहुंचे। शिव जी ने वह विष पी लिया, पर उसे गले से नीचे नहीं उतरने दिया। विष के प्रभाव से कंठ नीला पड़ गया और उनका नाम नीलकंठ पड़ा।
शिवलिंग का अर्थ
संस्कृत में लिंग का एक अर्थ है चिह्न या प्रतीक। शिवलिंग को निराकार परमात्मा का प्रतीक माना जाता है। लिंग पुराण और शिव पुराण में एक कथा आती है जिसमें ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद होता है। तभी बीच में एक अनंत ज्योति स्तंभ प्रकट होता है, जिसका न आदि दिखता है न अंत। वही शिव का लिंग रूप माना गया।
सोमवार की पूजा कैसे करें
सुबह स्नान करके शिव मंदिर या घर में शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।
कच्चा दूध, बेलपत्र, सफेद फूल और धतूरा चढ़ाने की परंपरा है।
बेलपत्र में तीन पत्तियां हों और कटी फटी न हों।
व्रत रखना चाहें तो दिन में फल और दूध लें, शाम को पूजा के बाद सात्विक भोजन करें।
शिव मंत्र
ॐ नमः शिवाय पंचाक्षर मंत्र है और सबसे सरल है। अकाल मृत्यु या रोग के भय के लिए लोग महामृत्युंजय मंत्र का जप करते हैं, जो ऋग्वेद में आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शिवलिंग पर तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते?
परंपरा में इसे वर्जित माना गया है और इसके पीछे जालंधर और वृंदा की कथा बताई जाती है।
सोमवार को शिव जी की पूजा क्यों होती है?
सोमवार चंद्रमा का दिन है और चंद्रमा शिव के मस्तक पर है, इसलिए यह दिन उनसे जोड़ा गया।
क्या महिलाएं शिवलिंग की पूजा कर सकती हैं?
हां। सोमवार व्रत और शिव पूजा महिलाएं बड़ी संख्या में करती हैं। कुछ मंदिरों में स्थानीय नियम हो सकते हैं।
शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या अंतर है?
हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि कहलाती है। फाल्गुन मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है।
