Shivratri Vrat

मासिक शिवरात्रि

परंपरा में प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिव-उपासना की तिथि मानी गई है। माघ (पुर्णिमांत) अथवा फाल्गुन (अमांत) मास की यही चतुर्दशी महाशिवरात्रि के रूप में प्रसि…

मासिक शिवरात्रि व्रत

देवता

भगवान शिव

तिथि / समय

प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी

श्रेणी

Shivratri व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा में प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिव-उपासना की तिथि मानी गई है। माघ (पुर्णिमांत) अथवा फाल्गुन (अमांत) मास की यही चतुर्दशी महाशिवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध हुई। कथा-परंपरा में एक प्रसिद्ध प्रसंग एक शिकारी से जुड़ा है, जो मासिक शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि दोनों की कथाओं में आता है।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    चतुर्दशी के दिन उपवास रखें, रात्रि में शिव-पूजा करें तथा जागरण वैकल्पिक रूप से करें। शिवलिंग पर जल-दूध अर्पण करें, बेलपत्र चढ़ाएँ तथा चारों प्रहरों में पूजा का विधान रखें। शिव-पुराण की कथा का श्रवण करें। विशेष रूप से माघ मास की चतुर्दशी में यह व्रत महाशिवरात्रि के रूप म मनाया जाता है। जागरण एवं रुद्राभिषेक का विशेष फल बताया गया है।

पूजा सामग्री

  • जल
  • दूध
  • बेलपत्र
  • चंदन
  • धूप-दीप
  • फल
  • भाँग-धतूरा

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

रोग-नाश, भय-नाश, मनोकामना-सिद्धि एवं शिव-लोक-प्राप्ति।

व्रत कथा

परंपरा में प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिव-उपासना की तिथि मानी गई है। माघ (पुर्णिमांत) अथवा फाल्गुन (अमांत) मास की यही चतुर्दशी महाशिवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध हुई। कथा-परंपरा में एक प्रसिद्ध प्रसंग एक शिकारी से जुड़ा है, जो मासिक शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि दोनों की कथाओं में आता है।

कथा है कि एक बार एक भील-शिकारी निराहार अवस्था में जंगल में भटक गया। शिकार न मिलने से वह दुःखी होकर एक बेल-वृक्ष के नीचे बैठ गया। रात्रि हो आई तथा भूख-तृषा से व्याकुल शिकारी वृक्ष के पत्ते तोड़ने लगा। उसके नीचे शिवलिंग था; तोड़े हुए बेलपत्र एवं उसके आँसू अनजाने में शिवलिंग पर गिरने लगे। इस प्रकार रात्रि भर शिकारी की अनजाने की अर्चना चलती रही, बेलपत्र, जल (आँसुओं के रूप में) तथा जागरण सब कुछ अनायास ही शिव-पूजा के रूप में हो गया। अधिकांश उपाचार अनायास सिद्ध हुए।

प्रातः काल में शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए तथा उस शिकारी को वरदान दिया। इस कथा का भाव यही है कि चतुर्दशी की रात्रि में शिवलिंग पर जल-बेलपत्र का अर्पण तथा जागरण अनायास कर्म से भी फलदायी होता है। व्रत के प्रति निष्ठा या विधि का ज्ञान न होने पर भी शुभ तिथि की रात्रि का स्मरण महात्म्म रखता है।

मासिक शिवरात्रि का नियमित पालन करने वाले भक्तों के जीवन में रोग, भय तथा दरिद्रता का नाश होता है, यह विश्वास परंपरा में प्रतिपादित है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप इस व्रत में विशेष रूप से किया जाता है। जो भक्त प्रत्येक मास की चतुर्दशी पर रात्रि-जागरण के साथ अभिषेक करते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा अंततः शिव-लोक की प्राप्ति होती है।

सामान्य प्रश्न

रोग-नाश, भय-नाश, मनोकामना-सिद्धि एवं शिव-लोक-प्राप्ति।

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