
संपूर्ण कथा
सती के देह त्याग के बाद शिवजी तपस्या में लीन हो गए। सती ने हिमालयराज हिमवान और मैना की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। देवर्षि नारद ने बताया कि वे शिवजी की ही अर्धांगिनी बनेंगी।
देवताओं ने कामदेव को शिवजी की तपस्या भंग करने भेजा। शिवजी ने ध्यान टूटने पर क्रोध में तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए। बाद में रति की प्रार्थना पर उन्हें अनंग रूप में पुनः स्वीकार किया गया। निराश न होकर पार्वती ने वन में कठोर तप आरंभ किया।
शिवजी ने उनकी परीक्षा ली और अंत में उनके दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। शुभ मुहूर्त में विवाह संपन्न हुआ, जिसमें देवता, गण और भूत-प्रेत सभी सम्मिलित हुए। इसी तिथि को महाशिवरात्रि के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
कथा का संदेश
सच्ची निष्ठा और तपस्या से असंभव लगने वाला लक्ष्य भी प्राप्त हो सकता है।
