
देवता
भगवान शिव एवं माता पार्वती
तिथि / समय
माघ/फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमान्त अनुसार माघ)
श्रेणी
Shivratri व्रत
व्रत का परिचय
शिव पुराण की कथा के अनुसार इसी रात्रि में भगवान शिव लिंग स्वरूप में प्रकट हुए थे और ब्रह्मा-विष्णु लिंग के अन्त एवं आदि को खोजने से व्यर्थ थक गए थे। कथा है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा एवं विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद छिड़ा। तभी उनके मध्य एक अनादि-अंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। दोनों ने उसकी पराकाष्ठा खोजने का निश्चय किया, विष्णु वराह बनकर नीचे की ओर गए तथा ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर की ओर गए। दोनों को लिंग का अंत न मिला। ब्रह्मा ने लौटकर झूठा साक्ष्य दिया कि उन्होंने लिंग का अंत देख लिया है। इस असत्य पर शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया कि उनकी उपासना त्रिलोक में न होगी। तब से इस तिथि पर लिंगोद्भव-शिव की आराधना का विधान हुआ।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
चतुर्दशी के दिन निराहार उपवास रखें। चार प्रहरों में चार बार शिव-पूजा करें, प्रत्येक प्रहर में जल, दूध, शहद, घी, गंगाजल आदि से अलग- अलग अभिषेक करें तथा बेलपत्र, धतूरा, भाँग, चंदन अर्पित करें। रात्रि जागरण में शिव-पुराण कथा, रुद्री पाठ एवं भजन करें। चतुर्दशी के दिन चांदी का दान करने का विशेष विधान है। प्रातः पारण करें तथा ब्राह्मण-भोजन कराएँ।
पूजा सामग्री
- जल
- कच्चा दूध
- शहद
- गंगाजल
- बेलपत्र
- धतूरा
- भाँग
- चंदन
- रुद्राक्ष
- भस्म
- फल
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
समस्त पापों का नाश, स्वर्ग-तत्काल-मुक्ति का विश्वास, शिव-कैलास-प्राप्ति एवं मनोकामना-सिद्धि।
व्रत कथा
शिव पुराण की कथा के अनुसार इसी रात्रि में भगवान शिव लिंग स्वरूप में प्रकट हुए थे और ब्रह्मा-विष्णु लिंग के अन्त एवं आदि को खोजने से व्यर्थ थक गए थे। कथा है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा एवं विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद छिड़ा। तभी उनके मध्य एक अनादि-अंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। दोनों ने उसकी पराकाष्ठा खोजने का निश्चय किया, विष्णु वराह बनकर नीचे की ओर गए तथा ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर की ओर गए। दोनों को लिंग का अंत न मिला। ब्रह्मा ने लौटकर झूठा साक्ष्य दिया कि उन्होंने लिंग का अंत देख लिया है। इस असत्य पर शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया कि उनकी उपासना त्रिलोक में न होगी। तब से इस तिथि पर लिंगोद्भव-शिव की आराधना का विधान हुआ।
दूसरी प्रसिद्ध कथा भील-शिकारी की है, एक बार एक शिकारी शिकार की विफलता से निराश होकर जंगल में एक बेल-वृक्ष के नीचे सो नहीं सका। जलाशय के शोर की आवाज़ों से वह जागता रहा और ऊपर से बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा। पत्तों के नीचे एक शिवलिंग था; शिकारी के निराहार जागरण, बेलपत्र-अर्चना एवं आँसुओं के जल से अभिषेक अनायास शिव-पूजा बन गई। प्रसन्न होकर शिव ने उसे वरदान दिया। महाशिवरात्रि की रात्रि-पूजा का यही शिकारी-प्रसंग सर्वाधिक प्रचलित है।
तीसरी कथा पार्वती जी से जुड़ी है, परंपरा के अनुसार पार्वती जी ने इसी रात्रि में शिव के लिए कठोर तप किया तथा प्रसन्न शिव ने उनसे विवाह कर उन्हें अपने सम उत्तम अर्धांग बनाया। भक्त परंपरा में इसे शादी की शुभ तिथि के रूप में मनाया जाता है, इसी रात्रि 'शिव-पार्वती विवाह' का स्मरण आयोजन घर-घर में होता है।
महाशिवरात्रि का व्रत साधक के अंतर-तत्त्व की शुद्धि से जुड़ा माना गया है। चार प्रहरों की पूजा का अर्थ जीवन-रात्रि के चार चरणों में शिव-स्मरण बनाए रखना है। जो साधक इस रात्रि जागरण एवं अभिषेक से शिव-आराधना करता है, उसके पाप-संचय का दहन होता है तथा अंतकाल में कैलास-गमन की प्राप्ति होती है, यह शिव पुराण परंपरा का स्पष्ट विश्वास है। विशेष फल चतुर्दशी के दिन चांदी एवं श्वेत वस्तुओं के दान से प्राप्त होता है।
सामान्य प्रश्न
समस्त पापों का नाश, स्वर्ग-तत्काल-मुक्ति का विश्वास, शिव-कैलास-प्राप्ति एवं मनोकामना-सिद्धि।
