
संतोषी माता
संतोषी माता
संतोषी माता का नाम वेदों या प्रमुख पुराणों में नहीं मिलता। यह एक लोक परंपरा है, जो उत्तर भारत में 1960 के दशक के बाद तेजी से फैली। 1975 की फिल्म "जय संतोषी मां" के बाद यह व्रत घर घर पहुंचा। इसका मतलब यह नहीं कि श्रद्धा कम है। करोड़ों लोग इस व्रत को निभाते हैं। बस लिखते समय इसे "लोक मान्यता के अनुसार" कहना सही रहेगा, पुराण का प्रसंग बताकर नहीं।
लोक कथाओं में उन्हें गणेश जी की पुत्री माना जाता है। एक प्रचलित कहानी के अनुसार रक्षाबंधन पर गणेश जी के पुत्र शुभ और लाभ ने बहन की मांग की। तब गणेश जी की पत्नियों रिद्धि और सिद्धि की शक्ति से एक कन्या प्रकट हुईं, जिनका नाम संतोषी पड़ा। संतोष का अर्थ है जो मिला उसमें तृप्त रहना। नाम का भाव ही इस व्रत का सार है। गणेश जी के बारे में हमारे गणेश जी की पूजा विधि वाले लेख में पढ़ें।
मंत्र
ॐ संतोषी माता नमः
हे संतोषी माँ, आपको नमस्कार।
संतोषी माता व्रत कथा और पूजा विधि
पहले एक जरूरी बात
संतोषी माता का नाम वेदों या प्रमुख पुराणों में नहीं मिलता। यह एक लोक परंपरा है, जो उत्तर भारत में 1960 के दशक के बाद तेजी से फैली। 1975 की फिल्म "जय संतोषी मां" के बाद यह व्रत घर घर पहुंचा। इसका मतलब यह नहीं कि श्रद्धा कम है। करोड़ों लोग इस व्रत को निभाते हैं। बस लिखते समय इसे "लोक मान्यता के अनुसार" कहना सही रहेगा, पुराण का प्रसंग बताकर नहीं।
संतोषी माता कौन हैं
लोक कथाओं में उन्हें गणेश जी की पुत्री माना जाता है। एक प्रचलित कहानी के अनुसार रक्षाबंधन पर गणेश जी के पुत्र शुभ और लाभ ने बहन की मांग की। तब गणेश जी की पत्नियों रिद्धि और सिद्धि की शक्ति से एक कन्या प्रकट हुईं, जिनका नाम संतोषी पड़ा। संतोष का अर्थ है जो मिला उसमें तृप्त रहना। नाम का भाव ही इस व्रत का सार है। गणेश जी के बारे में हमारे गणेश जी की पूजा विधि वाले लेख में पढ़ें।
व्रत कथा का सार
व्रत की कथा एक बुढ़िया के सबसे छोटे बेटे और उसकी पत्नी की है। बेटा परदेस कमाने गया और वहीं रम गया, कई बरस खबर नहीं भेजी। घर पर बहू से सास और जेठानियां कठिन काम कराती थीं और रूखा खाना देती थीं।
एक दिन बहू ने कुछ स्त्रियों को संतोषी माता की पूजा करते देखा। उसने उनसे विधि पूछी और 16 शुक्रवार के व्रत का संकल्प लिया। व्रत के प्रभाव से पति का संदेश आया, फिर वह घर लौट आया और परिवार की स्थिति सुधर गई।
उद्यापन के समय जेठानियों ने जानबूझकर बच्चों को खट्टा मांगने के लिए भेज दिया, जिससे व्रत भंग हुआ। माता रुष्ट हुईं और बहू का पति संकट में पड़ गया। बहू ने क्षमा मांगकर फिर से व्रत किया, तब सब ठीक हुआ। कथा के ब्योरे अलग अलग क्षेत्रों में थोड़े भिन्न सुनाए जाते हैं।
कथा का भाव यह है कि धैर्य, नियम और संतोष का फल मिलता है, और दूसरों को परेशान करने वाले अंत में खुद परेशान होते हैं।
16 शुक्रवार का व्रत कैसे रखें
किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से शुरुआत करें। लगातार 16 शुक्रवार व्रत रखें।
सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा की जगह साफ करें।
चौकी पर संतोषी माता की मूर्ति या चित्र रखें और घी का दीपक जलाएं।
एक कलश में जल भरकर उस पर गुड़ चने से भरा कटोरा रखें।
माता को फूल, अक्षत, रोली और गुड़ चना चढ़ाएं।
व्रत कथा पढ़ें या सुनें। हाथ में थोड़ा गुड़ चना रखकर कथा सुनने की परंपरा है।
कथा के बाद आरती करें। कलश का जल घर में छिड़कें या तुलसी में डाल दें।
प्रसाद बांटें। गुड़ चना गाय को खिलाने की परंपरा भी है।
व्रत के नियम
व्रत के दिन घर में कोई भी खट्टी चीज न खाएं और न किसी को परोसें। इसमें नींबू, आमचूर, इमली, दही, अचार और खट्टे फल शामिल हैं।
जो व्रत रख रहा है, वह खट्टे पदार्थ को हाथ भी न लगाए, यह नियम कई घरों में निभाया जाता है।
एक समय भोजन किया जाता है, जिसमें मीठी या सादी चीजें हों।
क्रोध, झगड़े और कटु वचन से बचने को कहा गया है। कथा का मूल संदेश भी यही है।
अगर किसी महीने महिला रजस्वला हो, तो परंपरा में उस शुक्रवार को गिनती में नहीं लिया जाता और अगला शुक्रवार जोड़कर 16 पूरे किए जाते हैं। अलग घरों में नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए परिवार की रीति ही मानें।
उद्यापन विधि
16वें शुक्रवार को उद्यापन होता है।
सुबह की पूजा और कथा नियम से करें।
आठ बालकों को भोजन कराने की परंपरा है। कम से कम आठ बच्चे, जो खुद या परिवार से हों।
उन्हें खीर पूरी या हलवा पूरी जैसा मीठा, सात्विक भोजन कराएं। जो खाना परोसें उसमें कुछ खट्टा न हो।
भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा के रूप में कुछ पैसे या फल दें। परंपरा के अनुसार दक्षिणा में पैसों की जगह फल या कोई उपयोगी चीज देना बेहतर माना जाता है, ताकि वे बच्चे खट्टा खाने की इच्छा न करें।
अंत में माता से प्रार्थना करके व्रत पूरा करें।
उद्यापन की सटीक विधि और सामग्री की सूची पुजारी जी या कथा की पुस्तक से भी मिला लें।
संतोषी माता की आरती और मंत्र
सबसे प्रचलित आरती है "जय संतोषी माता"। इसे मंदिर या घर की आरती पुस्तिका से पढ़ें। सरल मंत्र:
ॐ श्री संतोषी मात्रे नमः
जय संतोषी माता
व्रत कथा में कुछ भी जोड़ने की जरूरत नहीं है। श्रद्धा से पढ़ना काफी है।
व्रत से जुड़े सुझाव
लगातार 16 हफ्ते निभाना कई लोगों के लिए आसान नहीं होता। पहले देखें कि आपकी सेहत, काम और घर की स्थिति इसकी इजाजत देती है या नहीं। डायबिटीज या कमजोरी हो तो उपवास की जगह फलाहार या सादा भोजन ही रखें। व्रत को बोझ नहीं, अपनी आदत सुधारने का मौका मानें। संतोष का अर्थ यह भी है कि जितना निभा सकें उतना निभाएं।
इस लेख को पढ़ने वाले महालक्ष्मी पूजा विधि वाले लेख में शुक्रवार की दूसरी पूजा परंपरा भी देख सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
संतोषी माता का व्रत कब शुरू करें?
किसी भी शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से। मनोकामना के लिए 16 शुक्रवार का संकल्प लिया जाता है।
संतोषी माता के व्रत में खट्टा क्यों नहीं खाते?
कथा में खट्टे से व्रत भंग होने का प्रसंग है, इसी कारण यह नियम बना। यह परंपरा संयम का अभ्यास भी मानी जाती है।
क्या संतोषी माता का नाम पुराणों में है?
नहीं। यह लोक परंपरा है जो पिछले कुछ दशकों में बहुत फैली है।
क्या पुरुष भी संतोषी माता का व्रत रख सकते हैं?
हां। परंपरा में महिलाएं ज्यादा रखती हैं, पर पुरुषों के लिए कोई रोक नहीं है।
मंत्र
पूजा विधि
आरती और भजन
