
देवता
सूर्य देव
तिथि / समय
प्रत्येक रविवार; रवि-योग वाले रविवार विशेष फलदायी
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
सूर्य देव को आरोग्य, तेज एवं कीर्ति का दाता माना गया है। कथा-परंपरा में सूर्य उपासना से रोग-शोक का नाश, दरिद्रता का उन्मूलन तथा मान-सम्मान की प्राप्ति होने का प्रतिपादन किया गया है। भविष्य पुराण की सूर्य-माहात्म्य परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार वर्णित है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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प्रातः स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल-अर्घ्य अर्पण करें और लाल पुष्प, लाल आसन एवं लाल वस्त्र का विधान रखें। अर्घ्य देते समय 'ॐ घृणिः सूर्याय नमः' या गायत्री मंत्र का जाप करें। उपवास वैकल्पिक है, व्रती एक समय फलाहार अथवा निराहार रह सकता है। सायंकाल सूर्य-स्तुति, गेहूँ-गुड़ का दान तथा कथा-श्रवण कर शुद्ध व्रती-भोजन करके व्रत संपन्न करें। रवि-योग में पड़ने वाले रविवार की उपासना अनेक गुना फलदायी मानी गई है।
पूजा सामग्री
- तांबे का लोटा एवं जल
- लाल पुष्प
- लाल आसन
- गेहूँ
- गुड़
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
आरोग्य, तेज एवं दारिद्रय-नाश की प्राप्ति; नेत्र-रोग शमन।
व्रत कथा
सूर्य देव को आरोग्य, तेज एवं कीर्ति का दाता माना गया है। कथा-परंपरा में सूर्य उपासना से रोग-शोक का नाश, दरिद्रता का उन्मूलन तथा मान-सम्मान की प्राप्ति होने का प्रतिपादन किया गया है। भविष्य पुराण की सूर्य-माहात्म्य परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार वर्णित है।
कथा है कि प्राचीन काल में एक नगरी में एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके पास धन-संपत्ति कुछ भी नहीं थी, परंतु वह प्रति रविवार प्रातः स्नान करके तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल-अर्घ्य अर्पित करता और लाल पुष्प चढ़ाकर षोडशोपचार पूजन करता था। दुर्भिक्ष के दिनों में जब घर में अन्न तक नहीं बचता था, तब भी उसकी यह नियम टूटती नहीं थी। पत्नी कभी-कभी चिंता से कहती, 'आराधना तो करो, पर संतान-पालन का भी ध्यान रखो।' ब्राह्मण कहता, 'सूर्य नारायण समस्त भुवन का प्रकाश हैं; भक्त का धैर्य कभी निष्फल नहीं जाता।'
एक रविवार की प्रातः ब्राह्मण के द्वार पर एक वृद्ध तपस्वी आया और उसने भिक्षा माँगी। घर में चने भर अन्न था; ब्राह्मण ने बिना कुछ सोचे वही अपने शिष्य के शब्दों सहित वृद्ध के चरणों में डाल दिया और स्वयं निराहार रह गया। वृद्ध तपस्वी सूर्य देव का ही परीक्षा-रूप था। अर्घ्य-जल अर्पित करते समय ब्राह्मण की आँखों में जो श्रद्धा-भाव था, उससे भास्कर प्रसन्न हो गए। अगले रविवार को वृद्ध रूप में पुनः प्रकट होकर उन्होंने कहा, 'हे भक्त, तुझे सूर्य-व्रत के अनुष्ठान का फल मिलने वाला है। घर के पीछे जो पुराना बरगद है, उसकी जड़ में कलश गड़ा है।' ब्राह्मण ने विधिपूर्वक रविवार व्रत करते हुए उस स्थान की खुदाई की और उसे स्वर्ण-मुद्राओं से भरा देखा। उसने उस धन का एक अंश देव-दान एवं ब्राह्मण-भोजन में लगाया और शेष से सुखपूर्वक गृहस्थी चलाई।
कथा का उपदेश यह है कि नियमित श्रद्धा एवं अतिथि-सेवा के संयोग से सूर्य-व्रत का फल शीघ्रता से प्राप्त होता है। जो स्त्री-पुरुष प्रति रविवार भास्कर को अर्घ्य-जल अर्पित करें, उनके शरीर के रोग, नेत्र-संबंधी विकार तथा मानसिक उदासी समाप्त होते हैं। परंपरा में विशेष यह नियम भी है कि रविवार के दिन लाल वस्त्र, लाल आसन तथा लाल पुष्प अर्पित करने चाहिए, क्योंकि रक्त वर्ण सूर्य की किरणों का प्रतीक माना गया है। व्रत के निर्वाह से जीवन में तेज, आरोग्य, संतान-सुख एवं कीर्ति बनी रहती है।
सामान्य प्रश्न
आरोग्य, तेज एवं दारिद्रय-नाश की प्राप्ति; नेत्र-रोग शमन।
