
मां गंगा
मां गंगा
अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इंद्र ने डर के मारे यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया। सगर के साठ हजार पुत्र घोड़ा ढूंढते हुए वहां पहुंचे और मुनि को चोर समझ बैठे। कपिल मुनि की तपस्या भंग हुई और उनकी दृष्टि से सभी पुत्र भस्म हो गए।
उनकी आत्माओं को मुक्ति तभी मिल सकती थी जब गंगा जल उनकी राख को छुए। गंगा तब स्वर्ग में थीं।
मंत्र
ॐ गंगायै नमः
हे गंगा माँ, आपको नमस्कार।
गंगा अवतरण की कथा और गंगा दशहरा
राजा सगर और उनके साठ हजार पुत्र
अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इंद्र ने डर के मारे यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया। सगर के साठ हजार पुत्र घोड़ा ढूंढते हुए वहां पहुंचे और मुनि को चोर समझ बैठे। कपिल मुनि की तपस्या भंग हुई और उनकी दृष्टि से सभी पुत्र भस्म हो गए।
उनकी आत्माओं को मुक्ति तभी मिल सकती थी जब गंगा जल उनकी राख को छुए। गंगा तब स्वर्ग में थीं।
तीन पीढ़ियों की कोशिश
राजा सगर के पौत्र अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप दोनों ने तपस्या की, पर सफल नहीं हुए। फिर दिलीप के पुत्र भागीरथ ने राजपाट छोड़कर कठिन तप किया। कथा में आता है कि उन्होंने हजारों साल तपस्या की। इसी वजह से कठिन और लंबी साधना के लिए भगीरथ प्रयास शब्द आज भी बोला जाता है।
ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वचन दिया। पर यह समस्या थी कि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि धरती उसे झेल नहीं पाती।
शिव की जटाओं में गंगा
ब्रह्मा जी ने भागीरथ से कहा कि गंगा के वेग को केवल शिव संभाल सकते हैं। भागीरथ ने फिर शिव की आराधना की। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। कथा के अनुसार गंगा को अपने वेग पर अभिमान था और शिव ने उसे शांत करने के लिए जटाओं में बांध लिया। फिर धीरे धीरे धारा को धरती पर छोड़ा। शिव के स्वरूप वाले लेख में जटाओं में गंगा का यही प्रतीक बताया गया है।
गंगा का मार्ग और नाम
भागीरथ आगे आगे रथ पर चले और गंगा उनके पीछे पीछे। रास्ते में जह्नु ऋषि का आश्रम पड़ा। गंगा के प्रवाह से उनकी यज्ञ सामग्री बह गई। क्रोध में उन्होंने गंगा को पी लिया। भागीरथ और देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को अपने कान से या जंघा से बाहर छोड़ा। इसी कारण गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। भागीरथ के पीछे चलने के कारण वे भागीरथी कहलाईं।
अंत में गंगा सगर पुत्रों की राख तक पहुंचीं और उन सबको मुक्ति मिली।
कुछ पुराणों में एक और मान्यता मिलती है कि वामन अवतार में विष्णु के चरण से गंगा का उद्गम हुआ। विष्णु जी के अवतारों के बारे में हमारे दशावतार वाले लेख में पढ़ सकते हैं।
गंगा दशहरा कब आता है
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है, यानी मई या जून के आसपास। मान्यता है कि इसी दिन गंगा धरती पर उतरीं। नाम में दश का अर्थ दस और हरा का अर्थ हरने वाला है। परंपरा में माना गया है कि इस दिन का स्नान दस तरह के पापों को हरता है। तिथि और स्नान का शुभ मुहूर्त पंचांग से देखें।
गंगा स्नान की मान्यता और उसका सही भाव
हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और गंगासागर में स्नान की परंपरा सबसे ज्यादा है। प्रयागराज का संगम गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के मिलन का स्थान माना जाता है। कुंभ का आयोजन भी इन्हीं नदियों के किनारों से जुड़ा है।
स्नान के साथ श्रद्धालु दीपदान करते हैं। छोटे दोनों में फूल और दीपक रखकर प्रवाहित किए जाते हैं। यहां एक बात ध्यान देने की है। प्लास्टिक, पॉलीथीन, बासी फूल और पूजा का सामान सीधे नदी में डालना गंगा को नुकसान पहुंचाता है। जिस नदी को मां मानते हैं, उसे साफ रखना पूजा का सबसे सीधा हिस्सा है। फूल और पूजन सामग्री के लिए अलग कलश या निर्धारित स्थान का उपयोग करें।
घर पर गंगा पूजा
हर कोई गंगा तट पर नहीं जा सकता। गंगा दशहरा पर घर में पूजा के लिए:
स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
साफ पात्र में गंगाजल भरकर दीपक जलाएं।
गंगा मां की आरती या स्तुति पढ़ें।
दान करें। इस दिन जल, अन्न और छाते का दान परंपरा में बताया गया है।
सरल मंत्र है ॐ श्री गंगायै नमः। नाम जप के लिए हर हर गंगे भी बोला जाता है।
गंगा और भीष्म
महाभारत में गंगा का एक और संबंध आता है। राजा शांतनु से विवाह के बाद गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते ही जल में प्रवाहित कर दिया। आठवां पुत्र देवव्रत था, जो बाद में भीष्म पितामह कहलाए। यह कथा एक श्राप से जुड़ी है जिसमें आठ वसुओं को मनुष्य जन्म लेना था। विस्तार के लिए महाभारत के आदिपर्व में देखा जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गंगा को पापनाशिनी क्यों कहा जाता है?
परंपरा में माना गया है कि गंगा जल पवित्र करने वाला है। भक्त इसे मन और आचरण की शुद्धि का प्रतीक भी मानते हैं।
गंगाजल लंबे समय तक खराब क्यों नहीं होता?
यह एक प्रचलित मान्यता है। कुछ अध्ययनों में गंगाजल की जीवाणु रोधी विशेषताओं पर चर्चा हुई है, पर इस पर वैज्ञानिक राय अलग अलग रही है। लेख में पक्का दावा लिखने से बचें।
गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी में क्या अंतर है?
गंगा सप्तमी वैशाख शुक्ल सप्तमी को आती है और गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को। दोनों गंगा से जुड़े हैं और अलग अलग प्रसंगों की स्मृति में मनाए जाते हैं।
क्या घर में गंगाजल रखना जरूरी है?
जरूरी नहीं है। पर कई घरों में पूजा में छिड़कने और अंतिम समय के लिए रखने की परंपरा है। उसे साफ और ढककर रखें।
मंत्र
पूजा विधि
आरती और भजन
