संपूर्ण कथा
इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा। इंद्र ने उसे चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को खोजते हुए वहाँ पहुँचे और मुनि को चोर समझकर अपमान किया। मुनि के तेज से वे सभी भस्म हो गए और उनकी आत्माओं को मुक्ति न मिली।
सगर की आगे की पीढ़ियाँ गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास करती रहीं। अंत में राजा भगीरथ ने घोर तपस्या की। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने को तैयार हुए, पर गंगा के प्रचंड वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती थी। इसलिए भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की।
भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया और फिर धीरे-धीरे प्रवाहित किया। भगीरथ आगे-आगे रथ पर चले और गंगा उनके पीछे चलती हुई कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचीं। उनके जल के स्पर्श से सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। भगीरथ के नाम पर गंगा 'भागीरथी' भी कहलाती हैं।
कथा का संदेश
कठिन से कठिन लक्ष्य भी पीढ़ियों के निरंतर प्रयास और अटूट संकल्प से पूरा हो सकता है।
