
देवता
माँ गंगा
तिथि / समय
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा के अनुसार इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। कथा है कि सगर नाम के राजा के साठ हज़ार पुत्र थे। राजा के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को इंद्र ने छिपा दिया। पुत्रों ने छानबीन में कपिल मुनि के आश्रम में अश्व देखा तथा क्रोध में उन्हें ही चोर समझकर उपद्रव किया। कपिल मुनि की आँख से निकली अग्नि से साठ हज़ार पुत्र भस्म हो गए। उनकी आत्माओं को मुक्ति तब मिलनी थी जब गंगा-जल से उनके भस्म-स्थल का अभिषेक हो।
व्रत विधि
कैसे रखें
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गंगा-स्नान करें (संभव न हो तो घर में गंगाजल मिला जल से स्नान)। गंगा-पूजा एवं आरती करें, गंगा-स्तोत्र का पाठ करें तथा जल-दान करें। दश दिनों तक (वैशाख-ज्येष्ठ संधि से) स्नान-दान की परंपरा है, इसी से 'दशहरा' नाम जुड़ा। गंगाजल का कलश घर लाकर रखने तथा तुलसी में अर्पित करने का विधान है। दीप-दान एवं अन्न-दान विशेष फलदायी माना गया है। ब्राह्मण-भोजन एवं वस्त्र-दान करें।
पूजा सामग्री
- गंगाजल
- कलश
- फूल
- दीप-धूप
- दान-सामग्री
- जल-कुम्भ
- तुलसी
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सात जन्मों के पाप-नाश, पितृ-मुक्ति, स्नान-दान का अक्षय फल।
व्रत कथा
परंपरा के अनुसार इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। कथा है कि सगर नाम के राजा के साठ हज़ार पुत्र थे। राजा के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को इंद्र ने छिपा दिया। पुत्रों ने छानबीन में कपिल मुनि के आश्रम में अश्व देखा तथा क्रोध में उन्हें ही चोर समझकर उपद्रव किया। कपिल मुनि की आँख से निकली अग्नि से साठ हज़ार पुत्र भस्म हो गए। उनकी आत्माओं को मुक्ति तब मिलनी थी जब गंगा-जल से उनके भस्म-स्थल का अभिषेक हो।
सगर के वंश में भगीरथ हुए, परंपरा में उन्हें महान तपस्वी बताया गया है। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए घोर तप किया। वर्षों की तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गंगा-अवतरण का वरदान दिया, परंतु गंगा के वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती थी, इसीलिए भगीरथ ने शिव जी की आराधना की। शिव प्रसन्न होकर अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया तथा उन्हें धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा हिमालय से निकलकर भगीरथ के अनुसरण में सागर से होती हुई पाताल पहुँची तथा सगर-पुत्रों के भस्म का अभिषेक कर उन्हें मुक्त किया। जिस तप-शक्ति से गंगा अवतरित हुई उसे 'भगीरथी' कहा गया। इसी प्रसंग की स्मृति में गंगा दशहरा मनाया जाता है।
रामायण-परंपरा में एक प्रसंग यह भी है कि भगवान राम ने लंका में विभीषण को राज्याभिषेक के उपरांत श्राद्ध करते समय गंगा की आवश्यकता बताई; दक्षिण की ओर गंगा न थी, तब परंपरा के अनुसार राम ने अपने बाण से समुद्र से गंगा-धारा को प्रकट किया (सेतु-बंध के प्रसंग से जुड़ी कथा)। गंगा दशहरा के स्नान-दान से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं, यह अटल विश्वास परंपरा में प्रतिपादित है। जल-दान, दीप-दान तथा पितृ-तर्पण इस पर्व के विशिष्ट अंग हैं।
सामान्य प्रश्न
सात जन्मों के पाप-नाश, पितृ-मुक्ति, स्नान-दान का अक्षय फल।
