Aur Vrat Vrat

गंगा-अवतरण की विस्तृत कथा

गंगा-अवतरण की कथा सगर-वंश एवं भगीरथ-तप की कथा है। परंपरा के अनुसार सूर्यवंश में सगर नाम के महाप्रतापी राजा हुए। उनकी एक पत्नी के अंश से षष्टि हज़ार पुत्र उत्पन्…

गंगा-अवतरण की विस्तृत कथा व्रत

देवता

तिथि / समय

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

गंगा-अवतरण की कथा सगर-वंश एवं भगीरथ-तप की कथा है। परंपरा के अनुसार सूर्यवंश में सगर नाम के महाप्रतापी राजा हुए। उनकी एक पत्नी के अंश से षष्टि हज़ार पुत्र उत्पन्न हुए तथा दूसरी पत्नी के गर्भ से एक गर्भ-कोश रूप में अंगार-संतान मिली, जिससे असमंज उत्पन्न हुए, असमंज के पुत्र भगीरथ थे जो अपने पिता के शाप से भी प्रसिद्ध थे। भगीरथ बाल्यावस्था से ही घोर तपस्वी एवं धर्म-निष्ठ हुए।

व्रत विधि

कैसे रखें

  1. 1

पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    गंगा-अवतरण की कथा सगर-वंश एवं भगीरथ-तप की कथा है। परंपरा के अनुसार सूर्यवंश में सगर नाम के महाप्रतापी राजा हुए। उनकी एक पत्नी के अंश से षष्टि हज़ार पुत्र उत्पन्न हुए तथा दूसरी पत्नी के गर्भ से एक गर्भ-कोश रूप में अंगार-संतान मिली, जिससे असमंज उत्पन्न हुए, असमंज के पुत्र भगीरथ थे जो अपने पिता के शाप से भी प्रसिद्ध थे। भगीरथ बाल्यावस्था से ही घोर तपस्वी एवं धर्म-निष्ठ हुए।

    सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आरंभ किया। यज्ञ का अश्व इंद्र के छिपाने से पाताल-स्थित कपिल मुनि के आश्रम में पहुँच गया। षष्टि हज़ार पुत्रों ने अश्व को कपिल मुनि के पास बंधा देखा तथा उन्होंने मुनि को ही चोर मानकर उपद्रव आरंभ किया। कपिल मुनि की आँख से निकले तेज से समस्त पुत्र भस्म हो गए। उनका अंत्येष्टि-कर्म न हो सका; परंपरा में उन्हें भस्म-रूप में पाताल में पड़े रहना पड़ा, उनका उद्धार तभी संभव था जब गंगा-जल उनके भस्म पर प्रवाहित हो।

    भगीरथ ने पितामहों की इस दशा का समाधान खोजने का संकल्प लिया। उन्होंने गंगा को स्वर्ग से धरती पर अवतरित कराने के लिए कठोर तप आरंभ किया। वर्षों की तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए तथा वरदान दिया कि गंगा उनके पुत्रों के गर्भ से पृथ्वी पर आएगी। परंतु गंगा का वेग, स्वर्ग-पतित जल-राशि, कोई धरती नहीं सह सकती थी। भगीरथ ने पुनः शिव की आराधना की।

    शिव प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने का आश्वासन दिया। गंगा स्वर्ग से अवतरित होने के अहंकार से भरकर भीषण वेग से शिव के शिर पर गिरी, परंतु शिव ने उसे अपनी जटाओं में बाँध लिया, समस्त जल-राशि वहीं बँधकर रह गई। भगीरथ ने पुनः शिव की उपासना की तब उन्होंने गंगा को एक सूक्ष्म धारा से धरती पर प्रवाहित किया। गंगा भगीरथ के अनुसरण में बहती हुई पाताल पहुँची तथा सगर-पुत्रों के भस्म का अभिषेक करके उन सबका उद्धार किया।

    जिस तप-शक्ति से गंगा का अवतरण हुआ उसे 'भगीरथी' की संज्ञा दी गई, गंगा के नामों में भगीरथी प्रमुख है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा धरती पर आई मानी गई, इसी स्मृति में गंगा दशहरा मनाया जाता है। कथा का उपदेश यह है कि निष्ठा-तप असंभव-से-लगने वाले कार्य भी संभव कर देता है, एक पुरुष के संकल्प ने स्वर्ग की नदी को धरती पर उतारा। गंगा-जल के स्पर्श मात्र से पापों का नाश होता है तथा पितरों की तृप्ति होती है, यह इस पर्व का आधार-विश्वास है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

    इस व्रत की कथा Sanatan Seva ऐप में सुनें, मंत्र और आरती के साथ

    संबंधित सामग्री

    सभी व्रतों पर वापस जाएँ