
कार्तिकेय जी
कार्तिकेय जी
तारकासुर ने ब्रह्मा जी से वर पाया था कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो। उस समय शिव सती के वियोग में तपस्या में लीन थे और विवाह करना ही नहीं चाहते थे। इसी कारण देवताओं ने पार्वती के तप और शिव से उनके विवाह का मार्ग बनाया। यह कथा हरतालिका तीज वाले लेख में विस्तार से है।
शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार शिव के तेज को अग्नि और गंगा ने धारण किया और वह सरकंडों के वन में पहुंचा। वहां छह बालक रूप प्रकट हुए। छह कृत्तिकाओं ने उनका पालन किया, इसलिए नाम कार्तिकेय पड़ा। पार्वती ने जब छहों को गोद में उठाया तो वे एक शरीर में छह मुखों वाले हो गए। इसी कारण उन्हें षण्मुख कहा जाता है।
मंत्र
ॐ सरवणभावाय नमः
हे सरवण-पुत्र कार्तिकेय, आपको नमस्कार।
भगवान कार्तिकेय कौन हैं: कथा और मंदिर
जन्म की कथा
तारकासुर ने ब्रह्मा जी से वर पाया था कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो। उस समय शिव सती के वियोग में तपस्या में लीन थे और विवाह करना ही नहीं चाहते थे। इसी कारण देवताओं ने पार्वती के तप और शिव से उनके विवाह का मार्ग बनाया। यह कथा हरतालिका तीज वाले लेख में विस्तार से है।
शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार शिव के तेज को अग्नि और गंगा ने धारण किया और वह सरकंडों के वन में पहुंचा। वहां छह बालक रूप प्रकट हुए। छह कृत्तिकाओं ने उनका पालन किया, इसलिए नाम कार्तिकेय पड़ा। पार्वती ने जब छहों को गोद में उठाया तो वे एक शरीर में छह मुखों वाले हो गए। इसी कारण उन्हें षण्मुख कहा जाता है।
बड़े होकर उन्होंने देवताओं की सेना का नेतृत्व संभाला और तारकासुर का वध किया। देवसेना के सेनापति के रूप में उनकी पहचान यहीं से बनी।
स्वरूप और प्रतीक
मोर: वाहन के रूप में पूरी सृष्टि के अहंकार पर विजय का भाव।
वेल या भाला: ज्ञान और शक्ति का प्रतीक। इसे पार्वती जी ने उन्हें दिया था, ऐसा तमिल परंपरा में कहा जाता है।
मुर्गा ध्वज: कुछ परंपराओं में ध्वज पर मुर्गे का चिह्न मिलता है।
दो पत्नियां: देवसेना और वल्ली। दक्षिण परंपरा में वल्ली एक वनवासी कन्या थीं, जिनसे मुरुगन ने विवाह किया।
उत्तर में कम, दक्षिण में ज्यादा पूजा क्यों
यहां लोक कथा काम आती है। एक कथा में गणेश और कार्तिकेय के बीच पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा की शर्त लगी। कार्तिकेय अपने मोर पर निकल पड़े, जबकि गणेश ने माता पिता की परिक्रमा कर ली और विजयी घोषित हुए। नाराज कार्तिकेय कैलाश छोड़कर दक्षिण चले गए और पलनी की पहाड़ी पर रहने लगे। यह कथा दक्षिण भारत की परंपरा में ज्यादा सुनाई जाती है।
इतिहास की दृष्टि से कार्तिकेय की पूजा उत्तर भारत में गुप्त काल तक बहुत प्रचलित थी। कुषाण और गुप्त सिक्कों पर उनका चित्र मिलता है। बाद में गणेश और विष्णु के उपासक संप्रदाय बढ़ने से उनकी लोकप्रियता घटी, जबकि तमिल भक्ति परंपरा में वे लगातार केंद्र में रहे। गणेश जी की कथा आप हमारे गणेश जी वाले लेख में पढ़ सकते हैं।
अरुपदै वीडु, मुरुगन के छह प्रमुख धाम
तमिलनाडु में मुरुगन के छह प्रसिद्ध स्थान माने जाते हैं, जिन्हें अरुपदै वीडु कहते हैं:
तिरुपरंकुंद्रम (मदुरै के पास)
तिरुचेंदूर (समुद्र तट पर)
पलनी
स्वामीमलै
तिरुत्तणी
पलमुदिरचोलै
इनके अलावा केरल, कर्नाटक और श्रीलंका में भी मुरुगन के मंदिर हैं। उत्तर भारत में पुष्कर में कार्तिकेय का मंदिर माना जाता है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में कार्तिक स्वामी मंदिर भी प्रसिद्ध है, जहां कुछ परंपराओं के अनुसार महिलाओं के प्रवेश को लेकर स्थानीय नियम बताए जाते हैं। ऐसे नियम बदल सकते हैं, इसलिए छापने से पहले जांच लें।
प्रमुख पर्व
स्कंद षष्ठी: कार्तिक मास या तमिल परंपरा में आइप्पसी मास की शुक्ल षष्ठी पर छह दिन का उत्सव होता है, जिसमें सूरसंहारम यानी असुर वध का मंचन होता है।
थाईपूसम: तमिल थाई मास की पुष्य नक्षत्र वाली पूर्णिमा। भक्त कावड़ी उठाते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा: इस दिन कार्तिकेय के दर्शन का विशेष महत्व माना गया है।
तिथियां हर साल बदलती हैं, पंचांग देख लें। नवरात्रि के पांचवें दिन की देवी स्कंदमाता कार्तिकेय की ही माता हैं, जिनकी चर्चा नवदुर्गा वाले लेख में है।
पूजा और मंत्र
घर में पूजा करनी हो तो मंगलवार या षष्ठी तिथि चुनी जा सकती है। लाल फूल, चंदन, दीपक और फल का भोग रखें। मंत्र:
ॐ शरवणभवाय नमः
ॐ सुब्रह्मण्याय नमः
कंद षष्ठी कवचम तमिल भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय स्तुति है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कार्तिकेय किसके पुत्र हैं?
शिव और पार्वती के। गणेश जी उनके छोटे भाई माने जाते हैं, हालांकि कुछ परंपराओं में क्रम अलग है।
कार्तिकेय के कितने मुख हैं?
छह, इसलिए उन्हें षण्मुख कहते हैं।
मुरुगन और कार्तिकेय एक ही हैं?
हां। तमिल परंपरा में मुरुगन, उत्तर में कार्तिकेय और स्कंद एक ही देवता माने जाते हैं।
कार्तिकेय के वाहन का क्या नाम है?
मोर, जिसे दक्षिण परंपरा में परावनी कहा जाता है।
