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Bhagavad Gita · Adhyay 4
ज्ञान कर्म संन्यास योग
42 श्लोक, Jnana Karma Sanyasa Yoga

अध्याय का सार
कृष्ण अवतार-तत्व समझाते हैं: जब-जब धर्म की हानि होती है, वे युग-युग में शरीर धारण करते हैं। साथ ही वे बताते हैं कि ज्ञान से युक्त कर्म ही सब कर्मों का सर्वोत्तम है: ज्ञानाग्नि समस्त कर्म-बंधनों को भस्म कर देती है।
मुख्य शिक्षाएँ
- यदा यदा हि धर्मस्य, धर्म-रक्षा हेतु अवतार
- ज्ञान की अग्नि समस्त कर्मों को भस्म करती है
- जो सब आश्रय त्यागकर ज्ञान में शरण जाता है, उसे ज्ञान प्राप्त होता है
अध्याय 4 — सम्पूर्ण श्लोक (42)
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प्रतिनिधि श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
Yada yada hi dharmasya glanirbhavati bharata
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
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Aaj ka Bhakti Vichar
मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।
ॐ नमः शिवाय
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