Bhagavad Gita · Adhyay 3

कर्म योग

43 श्लोक, Karma Yoga

अध्याय 3 — कर्म योग

अध्याय का सार

कृष्ण कर्मयोग का विस्तार करते हैं: कर्म से मुक्ति नहीं, कर्म करते हुए मुक्ति। जनक जैसे राजर्षि ने कर्म करते हुए ही सिद्धि पाई। यज्ञ-भाव से किया कर्म बंधन नहीं करता; स्वार्थ रहित कर्म समाज के कल्याण का मार्ग है।

मुख्य शिक्षाएँ

  • निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ साधना है
  • यज्ञ-भाव से कर्म बंधन काटता है
  • अपना स्वधर्म (अपना कर्तव्य) श्रेष्ठ है, पराधर्म से

अध्याय 3 — सम्पूर्ण श्लोक (43)

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प्रतिनिधि श्लोक

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि॥

Karmanaiva hi samsiddhimasthita janakadayah

जनक आदि राजर्षियों ने कर्म द्वारा ही सिद्धि पाई; तुम भी लोक-संग्रह (जन-कल्याण) के लिए कर्म करो।

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6:15ॐ

Aaj ka Bhakti Vichar

मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।

ॐ नमः शिवाय

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