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Bhagavad Gita · Adhyay 2
सांख्य योग
72 श्लोक, Sankhya Yoga

अध्याय का सार
गीता का सार-अध्याय, कृष्ण अर्जुन के विषाद का उत्तर देते हैं: आत्मा अजन्मा, अमर और अविनाशी है; शरीर का नाश आत्मा को नहीं छूता। फिर वे निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं: कर्म करो, फल की आसक्ति छोड़ो। यह अध्याय कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों का बीज है।
मुख्य शिक्षाएँ
- आत्मा न कभी जन्म लेती है न मरती है
- कर्मण्येवाधिकारस्ते, फल पर नहीं, कर्म पर अधिकार है
- समता, सुख-दुःख में सम रहना योग है
अध्याय 2 — सम्पूर्ण श्लोक (72)
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प्रतिनिधि श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
Karmannyevadhikaraste ma phaleshu kadachana
तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं; फल की इच्छा से कर्म मत कर और कर्म न करने का आग्रह भी न रख।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
Nainam chhindanti shastrani nainam dahati pavakah
शस्त्र आत्मा को काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
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Aaj ka Bhakti Vichar
मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।
ॐ नमः शिवाय
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