Bhagavad Gita · Adhyay 1

अर्जुन विषाद योग

47 श्लोक, Arjuna Vishada Yoga

अध्याय 1 — अर्जुन विषाद योग

अध्याय का सार

कुरुक्षेत्र के युद्ध-भूमि में दोनों सेनाएँ सामने खड़ी हैं। अर्जुन अपने परिजनों, भीष्म, द्रोण, कृपा आदि गुरुजनों और भाइयों, को युद्ध के लिए आते देखकर विषाद में डूब जाता है। रथ से उतरकर वह धनुष त्याग बैठता है और श्री कृष्ण से कहता है कि यह युद्ध उसे किसी भी रूप में शुभ नहीं दिखता, यह पहला अध्याय मन की उस दशा का चित्रण है जब जीव को धर्म का भ्रम हो जाता है।

मुख्य शिक्षाएँ

  • कर्तव्य से पलायन मन की पहली दशा है
  • आत्मीय आसक्ति से विवेक मंद पड़ता है
  • संशय में डूबे अर्जुन ने शरण देने के लिए कृष्ण को गुरु बनाया

अध्याय 1 — सम्पूर्ण श्लोक (47)

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प्रतिनिधि श्लोक

किं नु नो गोविन्द नः सुखं स्यात् पापानि विनश्यति।

Kim nu no Govinda nah sukham syat papani vinashyati

हे गोविन्द! ऐसे पापों के नाश से हमें क्या सुख मिलेगा?

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

Seedanti mam gatrani mukham cha parishushyati

मेरे अंग काँप रहे हैं और मुख सूख रहा है (विषाद का वर्णन)।

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6:15ॐ

Aaj ka Bhakti Vichar

मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।

ॐ नमः शिवाय

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