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Bhagavad Gita · Adhyay 13
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
35 श्लोक, Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

अध्याय का सार
शरीर क्षेत्र है और आत्मा क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का जानने वाला)। कृष्ण क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का भेद समझाते हैं और प्रकृति के 24 तत्व तथा जीव के स्वरूप का वर्णन करते हैं। जो इस भेद को जानता है, वह मुक्त हो जाता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- शरीर क्षेत्र, आत्मा क्षेत्रज्ञ
- ज्ञेय, जो जानने योग्य है, वही ब्रह्म
- इड़ा-पिंगला से परे स्थित पुरुष का ज्ञान
अध्याय 13 — सम्पूर्ण श्लोक (35)
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प्रतिनिधि श्लोक
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।
Kshetrakshetrajnayorjnanam yattajjnanam matam mama
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।
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Aaj ka Bhakti Vichar
मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।
ॐ नमः शिवाय
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