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सुबह की पूजा कैसे करें: सरल विधि

18 सितंबर 20267 मिनट में पढ़ेंPuja Vidhi
सुबह की पूजा कैसे करें: सरल विधि

सुबह की पूजा कैसे करें? दैनिक पूजा की सरल विधि, जरूरी सामग्री और समय जानें। व्यस्त लोगों के लिए छोटी पूजा का तरीका भी।

सुबह की पूजा दिन की सबसे पहली साधना है। स्नान के बाद जब मन ताज़ा होता है, उस समय भगवान के सामने बैठकर कुछ मिनट बिताने से पूरे दिन की चाल शांत और सकारात्मक रहती है, ऐसा अनुभव उन लाखों लोगों का है जो यह आदत निभाते आए हैं। परंपरा में ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्योदय तक का समय पूजा के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया है।

सुबह की पूजा को दिन की सबसे पहली जीत मानें। जिस दिन पूजा हो जाती है, उस दिन की शुरुआत अनुशासित होती है और बाकी कामों में भी लगन आती है, ऐसा रोज पूजा करने वालों का लगभग साझा अनुभव है। धीरे धीरे यह छोटी आदत व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।

सुबह की पूजा के लिए कोई बड़ी तैयारी नहीं चाहिए। एक दीपक, थोड़ा जल, चावल, रोली और इष्ट देव के मंत्र से पूरी पूजा हो जाती है। जिन दिन समय ज्यादा हो उन दिन विस्तार से पूजा करें और जिन दिन जल्दी हो उन दिन छोटी पूजा से दिन शुरू कर दें, यही दैनिक पूजा का व्यावहारिक स्वरूप है।

सुबह उठने से पूजा तक का क्रम

1. आँख खुलते ही हथेलियाँ देखें और कराग्रे वसते लक्ष्मीः का उच्चारण करें, फिर धरती माता को प्रणाम करते हुए बिस्तर से उतरें।

2. स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। स्नान के समय गंगे च यमुने चैव मंत्र बोलने की परंपरा है।

3. सूर्योदय के समय तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्पित करें और ॐ घृणि सूर्याय नमः का उच्चारण करें।

4. पूजा स्थल पर आसन बिछाकर बैठें और आचमन करके मन को शांत करें।

5. गणेश वंदना करके इष्ट देव की पूजा करें, मंत्र जाप करें, दीपक और धूप दिखाकर आरती करें।

6. नैवेद्य का प्रसाद बाँटें, बड़ों का आशीर्वाद लें और दिन के काम में लग जाएँ।

पूजा के मुख्य मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः

अर्थ: हे गणों के स्वामी गणपति, आपको नमन। दैनिक पूजा का पहला मंत्र।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम उस तेजस्वी सविता देव के तेज का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को सही दिशा दे। सुबह की पूजा में गायत्री जाप की परंपरा है।

15 मिनट की पूजा विधि

जिन्हें रोज आधे घंटे नहीं मिलते, उनके लिए पंद्रह मिनट की पूजा की रूपरेखा सबसे काम की है। पहले दो मिनट आसन पर बैठकर मन शांत करें और संकल्प करें। अगले पाँच मिनट में भगवान को जल, रोली, चावल, चंदन और पुष्प अर्पित करें। फिर पाँच मिनट इष्ट मंत्र या गायत्री मंत्र का जाप करें और अंतिम तीन मिनट में दीपक, धूप, आरती और प्रार्थना कर लें।

यह क्रम एक बार बस जाने पर अपने आप चलने लगता है। बहुत से लोग सुबह की पूजा के साथ अपने दिन के लिए एक छोटा संकल्प भी जोड़ते हैं, जैसे आज किसी से बुरा व्यवहार नहीं करूँगा या आज का काम पूरी लगन से करूँगा। पूजा का यह व्यावहारिक रूप उसे कर्मठता की साधना बना देता है।

क्या करें जब समय बहुत कम हो

ट्रेन पकड़ने की जल्दी हो, ऑफिस की मीटिंग सुबह सुबह हो या बच्चों को स्कूल भेजना हो, ऐसे दिनों में दो मिनट की पूजा भी पूरी पूजा है। मंदिर के द्वार खोलकर भगवान को एक नजर देखें, दीपक जलाएँ, हाथ जोड़कर इष्ट मंत्र तीन बार बोलें और दिन की शुरुआत कर दें।

परंपरा में भाव को साधन से बड़ा माना गया है। जल्दी में की गई सच्ची प्रार्थना और अनेक सामग्री के साथ की गई व्यावहारिक पूजा में पहले को ही श्रेष्ठ बताया गया है। सफर में, होटल में या शरीर की असुविधा की स्थिति में मन के स्मरण से ही पूजा का भाव पूरा हो जाता है, ऐसी मान्यता पुरानी है।

परिवार के साथ पूजा

जहाँ परिवार के सदस्य मिलकर पूजा करते हैं, वहाँ बच्चों की श्रद्धा अपने आप बनती है। छोटे बच्चों को घंटी बजाने, फूल चढ़ाने और आरती में ताली बजाने की छोटी जिम्मेदारी दें। बड़े बच्चे आरती गाना और मंत्र सुनना सीखें, ऐसा परिवार का वातावरण बनाएँ।

रविवार की सुबह विशेष पूजा का दिन बनाने की परंपरा कई घरों में है। उस दिन सबसे ज्यादा समय मिलता है, इसलिए विस्तृत पूजा, अतिरिक्त भोग और साथ बैठकर प्रसाद का आनंद लिया जा सकता है। व्रतों के दिन तो पूरा परिवार पूजा में शामिल होता है, जिससे बच्चों को परंपरा की सीधी समझ मिलती है।

पूजा का समय तय करने का एक व्यावहारिक तरीका यह है कि उसे किसी रोज के काम से जोड़ दिया जाए। जैसे चाय बनाने से पहले दीपक जलाना या नाश्ते से पहले मंत्र जाप करना। जब पूजा किसी आदत से जुड़ जाती है तो उसे याद रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही निरंतरता का रहस्य है जो सुबह की पूजा को वर्षों तक चलाए रखता है।

ध्यान रखने वाली बातें

• पूजा से पहले स्नान जरूरी माना गया है, असमर्थता में आचमन से काम चलाएँ।

• पूजा के समय मोबाइल दूर रखें, एकांत में मन जल्दी लगता है।

• दीपक और धूप की देखभाल करें, आग से सावधानी रखें।

• पूजा की सामग्री को सम्मान से रखें, बिखरी हुई सामग्री को उठाकर सही जगह रखें।

• पूजा के बाद घर का काम निभाएँ, पूजा केवल अनुष्ठान नहीं, दिनचर्या की शुरुआत है।

पूजा के बाद मंदिर के द्वार बंद करते समय एक छोटी सी आदत और अपना लें, दीपक की लौ को एक क्षण देखें और मन में आज के दिन के लिए एक शुभ विचार रखें। यह पाँच सेकंड का कृत्य पूजा का भाव पूरे दिन तक ले जाता है, ऐसा नियमित पूजा करने वालों का अनुभव है।

सुबह की पूजा का समय और विधि घर घर अलग ढंग से चली आ रही है। कहीं सूर्य को जल देना आवश्यक अंग है, कहीं गायत्री जाप मुख्य है और कहीं इष्ट देव की आरती ही पूरी पूजा है। अपने घर की परंपरा के साथ चलें और सुबह की पूजा को निरंतर रखें, निरंतरता ही उसकी ताकत है। विशेष संकल्प या हवन के लिए पुरोहित से पूछ लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: सुबह की पूजा का सही समय क्या है?

उत्तर: ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले का समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय के आसपास का समय भी उत्तम है। जितने बजे भी उठें, स्नान के बाद नाश्ते से पहले पूजा कर लें, नियमितता समय से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

प्रश्न: सुबह की पूजा कैसे करें?

उत्तर: स्नान के बाद पूजा स्थल पर बैठकर गणेश वंदना से शुरुआत करें, भगवान को जल, रोली, चावल और पुष्प अर्पित करें, इष्ट मंत्र या गायत्री मंत्र का जाप करें, दीपक और धूप दिखाकर आरती करें और प्रसाद बाँटें। पूरी विधि 15 से 30 मिनट में हो जाती है।

प्रश्न: क्या बिना स्नान के पूजा कर सकते हैं?

उत्तर: पूजा से पहले स्नान करना शास्त्र सम्मत नियम है। बीमारी, सर्दी या किसी विवशता में आचमन करके और मन की शुद्धि के साथ पूजा की जा सकती है। आँख खुलते ही के मंत्र तो स्नान से पहले ही बोले जाते हैं।

प्रश्न: सुबह की पूजा में कौन सा मंत्र जाप करें?

उत्तर: शुरुआत गणेश मंत्र ॐ गं गणपतये नमः से करें और फिर अपने इष्ट देव का मंत्र जाप करें। गायत्री मंत्र सुबह की पूजा का प्रचलित अंग है। शिव भक्त ॐ नमः शिवाय और हनुमान भक्त हनुमान मंत्र या चालीसा पढ़ते हैं।

प्रश्न: रोज पूजा नहीं कर पाते तो क्या करें?

उत्तर: परंपरा में निरंतरता को विस्तार से बड़ा माना गया है। रोज दो मिनट की छोटी पूजा बनाएँ रखें, उसमें भगवान के दर्शन, दीपक और इष्ट मंत्र का तीन बार उच्चारण ही पर्याप्त है। रविवार या व्रत के दिन विस्तृत पूजा करें। छोटी पूजा भी अनुष्ठान नहीं होने से कहीं बेहतर है।

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