
गायत्री मंत्र का अर्थ क्या है और जाप कैसे करें? जानें गायत्री मंत्र का सरल हिंदी अर्थ, जाप के नियम, सही समय और विधि।
गायत्री मंत्र को वैदिक मंत्रों में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। यह ऋग्वेद के तीसरे मंडल का मंत्र है, जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। मंत्र सूर्य के सविता रूप को संबोधित है और इसमें बुद्धि के सही मार्गदर्शन की प्रार्थना है, इसीलिए इसे बुद्धि को जगाने वाला मंत्र कहा गया है।
इस मंत्र की विशेषता है कि यह किसी एक संप्रदाय या संप्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं रही। संध्या करने वाला हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी उपासना परंपरा से जुड़ा हो, गायत्री का जाप करता आया है। इसे माता का दर्जा दिया गया है और इसके 24 अक्षर हैं, जिन्हें चौबीस अक्षरी गायत्री भी कहते हैं।
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम उस प्रत्यक्ष, पवित्र और तेजस्वी सविता देव के तेज का ध्यान करते हैं। वही हमारी बुद्धि को सही दिशा और प्रेरणा दे।
मंत्र के शब्दों का अर्थ
भूः, भुवः और स्वः को तीन लोकों का संकेत माना गया है, जो भूलोक, अंतरिक्ष और स्वर्ग कहलाते हैं। कुछ व्याख्याओं में इन्हें शरीर, प्राण और मन के तीन स्तर भी कहा गया है। तत्सवितुर्वरेण्यं का अर्थ है उस सविता देवता को जो वरणीय यानी चुनने योग्य है। भर्गो शब्द तेज या प्रकाश का द्योतक है।
धीमहि का अर्थ है हम ध्यान करते हैं, यह एक सामूहिक प्रार्थना का शब्द है। धियो यो नः प्रचोदयात् यानी वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। सीधे शब्दों में यह मंत्र कहता है कि हम उस दिव्य प्रकाश के ध्यान में लीन हों जो हमारी सोच को शुद्ध और सही दिशा दे। यही इस मंत्र का सार है।
जाप का सही समय
परंपरा में दिन में तीन संध्या काल बताए गए हैं, प्रातः, मध्याह्न और सायं। तीनों समय गायत्री जाप के लिए उपयुक्त माने गए हैं, पर इनमें प्रातः काल की संध्या सबसे श्रेष्ठ बताई गई है। सूर्योदय से ठीक पहले और बाद का समय जाप के लिए आदर्श माना जाता है, क्योंकि उस समय की शांति में मंत्र के भाव मन पर गहराई से उतरते हैं।
व्यस्त दिनचर्या में तीनों समय न मिले तो कम से कम प्रातः का जाप न छोड़ें। सायंकाल का जाप सोने से पहले मन को शांत करता है, इसलिए घर के कई लोग रात को भी एक माला जपते हैं। मध्याह्न का जाप जो कर पाते हैं, उनके लिए अतिरिक्त फलदायक माना गया है।
जाप की विधि
1. स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा में मुख करके बैठें। सायंकाल में पश्चिम दिशा उचित मानी गई है।
2. आसन कुश या ऊन का हो तो श्रेष्ठ माना गया है। शरीर सीधा रखें और आँखें बंद करके भ्रूमध्य पर ध्यान केंद्रित करें।
3. मंत्र का उच्चारण धीमे स्वर में करें। परंपरा में तीन प्रकार के जाप बताए गए हैं, वाचिक यानी सुनाई देने वाला, उपांशु यानी होंठ हिलाकर और मानसिक यानी मन में। उपांशु जाप सबसे उत्तम माना गया है।
4. गिनती के लिए अँगुलि विधि का प्रचलन है। अँगूठे से उँगलियों की गाँठों को छूकर गिनती करते हैं, तर्जनी अँगुली का प्रयोग वर्जित माना गया है।
5. 10, 21, 54 या 108 बार का जाप करें। जाप के बाद गायत्री माता को प्रणाम करें और कुछ क्षण आँखें बंद करके शांत बैठें।
गायत्री माता और यज्ञोपवीत का संबंध
गायत्री मंत्र का उपदेश परंपरा में यज्ञोपवीत संस्कार के समय दिया जाता रहा है। बालक को इस संस्कार के साथ वैदिक अध्ययन की दुनिया में प्रवेश कराया जाता था और सबसे पहला मंत्र गायत्री ही होता था। इससे यह साफ है कि इस मंत्र को जीवन की नींव माना गया है, कोई गुप्त साधना नहीं।
गायत्री को वेदमाता कहा गया है। चारों वेदों का सार इसी मंत्र में समाया हुआ माना गया है, यह भक्तों की श्रद्धा है। संध्यावंदन की पूरी विधि इसी मंत्र के इर्द गिर्द घूमती है, जिसमें आचमन, प्राणायाम, जाप और अर्घ्य देना शामिल है। जो लोग पूरा संध्यावंदन नहीं कर पाते, वे केवल जाप करते हैं, जो परंपरा में स्वीकार्य रहा है।
संध्यावंदन में गायत्री का स्थान
संध्यावंदन की विधि गायत्री उपासना का विस्तारित रूप मानी गई है। इसमें आचमन से शुरुआत होती है, फिर प्राणायाम होता है, उसके बाद सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और अंत में गायत्री मंत्र का जाप होता है। जो लोग यह पूरी विधि करते हैं, उनके लिए गायत्री जाप पहले से ही उस क्रम का हिस्सा बन जाता है। जो केवल मंत्र जपते हैं, वे भी अर्घ्य और जाप का छोटा संयोजन अपना सकते हैं।
अर्घ्य देने की परंपरा में अंजलि भर जल ऊपर छोड़ा जाता है। मान्यता है कि सूर्य की ओर जल छोड़ने से उस किरण के साथ मन का भाव भी ऊपर उठता है। गायत्री मंत्र सविता देव को संबोधित है, इसलिए सूर्य के समय इस जाप का विशेष महत्व बताया गया है। जाप के बाद माता गायत्री को प्रणाम करना और कुछ क्षण मौन रहना, यह अंतिम क्रम है जो जाप की ऊर्जा को मन में बैठने देता है।
ध्यान रखने वाली बातें
• जाप से पहले स्नान जरूरी माना गया है, अगर किसी कारण से स्नान संभव न हो तो आचमन और मानसिक शुद्धि करके जाप करें।
• उच्चारण शुद्ध रखें, खासकर वरेण्यं और प्रचोदयात् जैसे शब्दों में। शुरुआत में किसी जानकार से उच्चारण सीख लेना उत्तम है।
• गायत्री जाप के लिए सामान्यतः माला का प्रयोग नहीं किया जाता, गिनती अँगुलियों से करने की परंपरा है।
• मंत्र का भाव याद रखें, यह बुद्धि की प्रार्थना है। यांत्रिक ढंग से गिनती भरने से जाप का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
• जाप के समय शौचालय या अपवित्र स्थान की ओर मुख न रखें, और बैठकर ही जाप करने का नियम है।
गायत्री जाप के संबंध में अलग अलग परंपराओं में मतभेद रहा है, कुछ संप्रदाय इसे विशेष दीक्षा के बाद ही जपने की बात करते हैं, वहीं व्यापक परंपरा में यह घर घर में स्वीकार्य रहा है। अपने परिवार और गुरु परंपरा के अनुसार निर्णय लेना सबसे उचित है। श्रद्धा और नियमितता किसी भी स्थिति में मुख्य रहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: गायत्री मंत्र का जाप कितनी बार करें?
उत्तर: परंपरा में 108 बार का जाप सर्वश्रेष्ठ माना गया है, पर 10, 21 या 54 बार भी जाप किया जाता है। संध्यावंदन की पूरी विधि में गायत्री का जाप हजारों की संख्या में होता है। सामान्य गृहस्थ के लिए एक माला पर्याप्त मानी गई है।
प्रश्न: क्या रात में गायत्री मंत्र जप सकते हैं?
उत्तर: जी हाँ, सायं संध्या का समय गायत्री जाप के लिए बताया गया है। रात को सोने से पहले मन शांत करने के लिए भी भक्त इसका जाप करते हैं। पर प्रातः काल की संध्या को सबसे बड़ा माना गया है।
प्रश्न: क्या गायत्री मंत्र कोई भी जप सकता है?
उत्तर: व्यापक परंपरा में गायत्री जाप घर घर में स्वीकार्य रहा है और इसे वेदमाता का मंत्र कहा गया है। कुछ विशिष्ट संप्रदाय दीक्षा की बात करते हैं, पर श्रद्धापूर्वक किया गया जाप परंपरा में सदा सम्मानित रहा है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चलना ठीक रहता है।
प्रश्न: गायत्री मंत्र जाप के क्या लाभ माने गए हैं?
उत्तर: शास्त्रों में इसे बुद्धि को प्रेरित करने वाला मंत्र बताया गया है। मान्यता है कि नियमित जाप से मन एकाग्र होता है, सोच शुद्ध होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। छात्रों के लिए इसका जाप विशेष उपयोगी माना गया है।
प्रश्न: गायत्री मंत्र किस देवता को समर्पित है?
उत्तर: यह मंत्र सविता देवता को समर्पित है, जो सूर्य का प्रेरक रूप माने गए हैं। गायत्री छंद में रचा जाने के कारण इसका नाम गायत्री मंत्र पड़ा। गायत्री को स्वयं देवी रूप में भी पूजा जाता है, जिन्हें वेदमाता कहा गया है।
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