
सुबह की पूजा में कौन से मंत्र पढ़ें? जानें दैनिक पूजा के मंत्र, स्नान के बाद का मंत्र, दीपक और आरती की विधि सरल हिंदी में।
सुबह की पूजा की एक तय परंपरा है जो घर घर एक जैसी रही है। आँख खोलने से लेकर स्नान, पूजा और आरती तक हर कदम के मंत्र बनाए गए हैं। जिन्हें पूरी विधि का समय नहीं मिलता, वे केवल मुख्य मंत्रों का जाप करके भी पूजा का भाव पूरा कर लेते हैं। यहाँ वही दैनिक क्रम और उसके मंत्र दिए गए हैं।
धार्मिक ग्रंथों में पूजा के लिए शुद्धता को पहली शर्त बताया गया है। इसीलिए मंत्रों का क्रम भी शुद्धि से शुरू होता है और आरती और प्रार्थना पर समाप्त होता है। इस क्रम का पालन करने से पूजा नियमबद्ध हो जाती है और सोचना नहीं पड़ता कि आगे क्या करना है।
आँख खुलते ही के मंत्र
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
अर्थ: हथेलियों में लक्ष्मी, सरस्वती और गोविंद का वास माना गया है, इसलिए सुबह सबसे पहले हाथ देखना शुभ है।
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥
अर्थ: हे धरती माता, आपको नमस्कार। मेरे पैरों के स्पर्श का दोष क्षमा करें। बिस्तर से उतरने से पहले यह प्रार्थना है।
स्नान का मंत्र
स्नान केवल शरीर की सफाई नहीं माना गया, बल्कि मन की शुद्धि की तैयारी है। नदियों को पवित्र जानकर स्नान के समय इस मंत्र का उच्चारण करने की परंपरा है।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
अर्थ: हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी, इस जल में आप सबका सान्निध्य हो जाए।
पूजा के मुख्य मंत्र
मंत्रों का शुद्ध उच्चारण सीखना भी उतना ही जरूरी है जितना उन्हें याद करना। घर के बड़े सदस्य बच्चों को मंत्र धीरे धीरे, खंड में तोड़कर सिखाते आए हैं। आज उच्चारण सुनने के साधन उपलब्ध हैं, पर साथ बैठकर सीखने का अपना अलग आनंद है। जब पूरा परिवार एक साथ मंत्र बोलता है तो उच्चारण अपने आप सुधर जाते हैं और बच्चों की भूलें भी तुरंत सुधर जाती हैं।
पूजा की शुरुआत गणेश जी से होती है, क्योंकि विघ्नहर्ता को सबसे पहले पूजने का नियम है। इसके बाद अपने इष्ट देव का जाप होता है और फिर गायत्री मंत्र का उच्चारण। तीनों का क्रम इस प्रकार रखा जाता है।
ॐ गं गणपतये नमः
अर्थ: हे गणों के स्वामी गणपति, आपको नमन। पूजा का पहला मंत्र।
ॐ नमः शिवाय
अर्थ: मैं शिव को नमन करता हूँ। शिव भक्तों का मुख्य जाप मंत्र।
गायत्री मंत्र के बाद दीपक जलाकर भगवान को दिखाया जाता है। दीपक दिखाते समय मन में इष्ट देव का स्मरण रखें। इसके बाद धूप, अगरबत्ती और फूल चढ़ाकर आरती होती है। संध्या के समय ॐ जय जगदीश हरे आरती की परंपरा सबसे व्यापक है, जबकि शिव परिवारों में शिव आबर्ष और देवी भक्तों में दुर्गा और लक्ष्मी जी की आरतियाँ गाई जाती हैं।
पूरे दिन के मंत्रों का क्रम
| क्रम | समय | मंत्र |
|---|---|---|
| 1 | आँख खुलते ही | कराग्रे वसते लक्ष्मीः |
| 2 | पैर ज़मीन पर रखते समय | समुद्रवसने देवि |
| 3 | स्नान के समय | गंगे च यमुने चैव |
| 4 | पूजा की शुरुआत | ॐ गं गणपतये नमः |
| 5 | इष्ट देव का जाप | ॐ नमः शिवाय आदि |
| 6 | दीपक और आरती | ॐ जय जगदीश हरे |
सोलह अंग पूजा का संक्षिप्त रूप
1. स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर आसन बिछाकर बैठें और कुछ क्षण मन शांत करें।
2. मन में संकल्प करें कि आज की पूजा श्रीमन्नारायण या अपने इष्ट के निमित्त की जा रही है।
3. गणेश जी का ध्यान करके उन्हें पुष्प अर्पित करें और विघ्न नाश की प्रार्थना करें।
4. इष्ट देव के सामने दीपक जलाएँ, धूप और फूल चढ़ाएँ और गंध या रोली लगाएँ।
5. इष्ट मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप करें और उसके बाद आरती और प्रार्थना करें।
6. प्रसाद बाँटें और घर के सदस्यों के साथ मिलकर पूजा का समापन करें।
व्यस्त लोगों के लिए छोटी पूजा
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई घंटों की पूजा नहीं कर सकता, और शास्त्रों ने भी इसकी छूट रखी है। एक बत्ती के दीपक, एक मुट्ठी फूल, इष्ट मंत्र के 11 बार जाप और मन की प्रार्थना, बस इतनी सी पूजा भी पूर्ण मानी गई है। कुछ लोग यह छोटी पूजा स्नान के बाद दो मिनट में निपटा लेते हैं, पर उनका दिन उसी शुभ शुरुआत से चलता है।
घर की सामूहिक पूजा का अपना अलग महत्व है। जहाँ परिवार के सदस्य मिलकर पूजा करते हैं और बच्चों को भी आरती में शामिल करते हैं, वहाँ भक्ति का वातावरण अपने आप बन जाता है। रविवार या किसी व्रत के दिन पूरी पूजा करें और बाकी दिन छोटी विधि से काम चलाएँ, यह व्यावहारिक तरीका है।
सूर्य अर्घ्य का मंत्र
सुबह की पूजा में सूर्य को जल अर्पित करने की परंपरा लगभग हर घर में रही है। तांबे के लोटे में जल भरकर सूर्य की ओर मुख करके धीरे धीरे जल छोड़ा जाता है और मंत्र बोला जाता है। मान्यता है कि इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और दिन ऊर्जा से बीतता है।
ॐ घृणि सूर्याय नमः
अर्थ: हे तेज से भरे सूर्य देव, आपको नमस्कार।
अर्घ्य देते समय जल को एक साथ न गिराएँ, पतली धार में धीरे धीरे छोड़ें ताकि मंत्र के पूरे उच्चारण तक जल चलता रहे। जल छोड़ने के बाद बचे हुए जल को पौधे में डाल दें, यह भी परंपरा का हिस्सा है। जो लोग छत पर या खुले स्थान पर नहीं जा पाते, वे खिड़की से सूर्य के दर्शन करके मंत्र बोल सकते हैं, मंत्र का भाव ही मुख्य है।
अलग अलग परंपराओं में पूजा के मंत्रों की संख्या और क्रम में अंतर रहता है। कहीं सूर्य अर्घ्य पहले होता है, कहीं गणेश वंदना से शुरुआत होती है। घर की जो परंपरा चली आ रही है, उसी के अनुसार चलना श्रेष्ठ है। विशेष पूजा या व्रत के दिन किसी जानकार पुरोहित से विधि पूछ लेना उचित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: सुबह की पूजा में कौन सा मंत्र सबसे पहले पढ़ें?
उत्तर: पूजा की शुरुआत में सबसे पहले गणेश वंदना का मंत्र ॐ गं गणपतये नमः बोला जाता है, क्योंकि गणेश जी को सबसे पहले पूजा जाता है। इसके बाद इष्ट देव का मंत्र और गायत्री मंत्र का उच्चारण होता है।
प्रश्न: सुबह की पूजा का सही समय क्या है?
उत्तर: ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले का समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय से पहले या ठीक बाद का समय भी पूजा के लिए उत्तम बताया गया है। व्यस्तता में यह समय न मिले तो नाश्ते से पहले कभी भी पूजा की जा सकती है।
प्रश्न: क्या बिना स्नान के सुबह की पूजा कर सकते हैं?
उत्तर: पूजा से पहले स्नान जरूरी माना गया है। पर आँख खुलते ही के मंत्र बिना स्नान के बोले जाते हैं। यदि बीमारी या अन्य कारण से स्नान नहीं हो पा रहा है तो आचमन करके और मन की शुद्धि के साथ पूजा करने की छूट परंपरा में है।
प्रश्न: सुबह की पूजा में कितने मंत्र जाप करने चाहिए?
उत्तर: प्रत्येक मुख्य मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप की परंपरा है। गायत्री मंत्र के साथ इष्ट मंत्र का एक माला जाप कर लेना पर्याप्त माना गया है। समय कम हो तो पाँच बार भी श्रद्धापूर्वक जाप स्वीकार्य है।
प्रश्न: सुबह की पूजा और संध्या में क्या अंतर है?
उत्तर: सुबह की पूजा में इष्ट देव की विधिवत पूजा, दीपक, फूल और आरती होती है, जबकि संध्या का अर्थ है दिन और रात के संधि समय का जाप और स्मरण। संध्या में गायत्री जाप की प्रमुखता रही है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं।
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