
माला से मंत्र जाप करने का सही तरीका जानें। रुद्राक्ष या तुलसी माला पकड़ने का नियम, गिनती का तरीका और जाप के नियम सरल हिंदी में।
माला जाप की परंपरा में सबसे पुराना और सबसे भरोसेमंद साधन रही है। मनकों को एक एक करके पीछे करते हुए मंत्र बोलना, गिनती की चिंता मिटा देता है और मन धीरे धीरे जाप की लय में बैठ जाता है। पर माला से जाप करने के कुछ नियम हैं जो शिष्ट परंपरा में सीखाए जाते रहे हैं।
इन नियमों का उद्देश्य दिखावा नहीं है, बल्कि ध्यान बनाए रखना है। जब हाथ और ज़ुबान दोनों एक क्रम में चलते हैं तो मन भटकने की जगह कम पाता है। यहाँ माला चुनने से लेकर जाप के अंत तक की पूरी विधि दी गई है।
कौन सी माला किसके लिए
हर देवता की उपासना के लिए एक विशेष माला की परंपरा रही है। यह विभाजन कठोर नियम नहीं, बल्कि लंबे अनुभव की देन माना गया है। सामान्य भक्त किसी भी माला से अपने इष्ट का जाप कर सकता है, पर परंपरागत मिलान यह है।
| माला | उपासना |
|---|---|
| रुद्राक्ष | भगवान शिव, महामृत्युंजय और रुद्र मंत्र |
| तुलसी | भगवान विष्णु, राम और कृष्ण |
| चंदन | सरस्वती, लक्ष्मी और सात्विक उपासना |
| स्फटिक | लक्ष्मी और शांति के जाप |
| मोती | चंद्र और माता की उपासना |
| मूँगा | हनुमान जी और दुर्गा उपासना |
माला पकड़ने का तरीका
माला को दाहिने हाथ में लिया जाता है। इसे बीच वाली उँगली और अँगूठे के बीच रखा जाता है, और अँगूठे से ही मनके को धकेला जाता है। तर्जनी उँगली का इस्तेमाल माला के लिए वर्जित माना गया है। कारण बताया गया है कि तर्जनी में तमस् की वृत्ति मानी गई है, इसलिए जाप की शुद्धता के लिए उसे माला से दूर रखा जाता है।
माला को गोद में रखकर या उसके नीचे साफ कपड़ा बिछाकर जाप करना श्रेष्ठ माना गया है, ताकि माला ज़मीन को न छुए। माला को झटके से या तेज़ी से न घुमाएँ, हर मनके के साथ एक मंत्र का उच्चारण हो, यही क्रम रखना है। कुछ लोग माला को हाथ से ऊपर की ओर उठाकर दिखाते हैं, ऐसा दिखावा शास्त्रों ने वर्जित किया है।
जाप की विधि
माला से जाप करते समय एक बात और काम आती है, जाप का स्थान तय रखना। जो साधक रोज एक ही जगह बैठकर जाप करता है, उसके मन में उस स्थान के साथ जाप का संबंध जुड़ जाता है। वहाँ बैठते ही मन शांत होने लगता है, जैसे मंदिर के द्वार पर पहुँचते ही भाव बदल जाता है। घर का कोना, पूजा घर या खिड़की के पास की जगह, जो भी चुनें, उसे बदलते न रहें।
1. शुद्ध शरीर और शुद्ध वस्त्रों के साथ शांत स्थान पर आसन बिछाकर बैठें। आसन कंबल या ऊन का हो तो ऊर्जा के संरक्षण की मान्यता है।
2. पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके बैठें और अपने इष्ट देव के सामने दीपक जलाकर माला को गोद में रखें।
3. मेरु मनके पर अँगूठा रखकर प्रार्थना करें और पहला मंत्र बोलकर पहला मनका पीछे करें।
4. हर मनके पर एक मंत्र बोलें। उच्चारण उपांशु यानी होंठ हिलाकर करना सर्वोत्तम माना गया है।
5. मेरु तक पहुँचकर माला उलट दें, पार न करें। जाप के बाद माला को प्रणाम करके साफ थैली या पोटली में रखें।
माला के प्रति आदर
माला को केवल एक मनकों की डोरी नहीं माना गया है। जाप की माला को इष्ट देव का ही स्वरूप मानकर उसका सम्मान करने की परंपरा है। इसे गले में डालकर इधर उधर घूमना, दूसरों को देना या खेलने के लिए दे देना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है। अपनी माला अपने पास रखें और उसे स्वच्छ स्थान पर रखें।
माला स्नान कराने की बात भी परंपरा में आती है। रुद्राक्ष की माला को समय समय पर गंगाजल या साफ जल से स्नान कराकर चंदन के तेल से विश्राम देने की रिवायत है। तुलसी की माला जल में नहीं डुबाई जाती, सूखी सफाई उचित रहती है। डोरी के टूट जाने पर नई डोरी में मनके पिरोकर माला को पुनः प्राण प्रतिष्ठा के भाव से इस्तेमाल किया जा सकता है।
माला कैसे चुनें
बाज़ार में कई तरह की मालाएँ मिलती हैं और खरीदते समय अक्सर सवाल होता है कि कौन सी ठीक रहेगी। रुद्राक्ष की माला खरीदते समय मनकों की जाँच करें, असली रुद्राक्ष की सतह पर प्राकृतिक रेखाएँ होती हैं और वह डूबने की परीक्षा में हल्का भार रखता है। बहुत चमकदार और एकदम समान मनकों वाली माला में सावधानी रखें। तुलसी की माला हल्की और खुशबूदार होती है, स्फटिक ठंडी और पारदर्शी।
माला की डोरी की मजबूती भी देखें, क्योंकि जाप की माला रोज इस्तेमाल होती है। मनकों का आकार अपनी सुविधा के अनुसार चुनें, छोटे मनकों वाली माला यात्रा के लिए अच्छी रहती है और बड़े मनके घर पर जाप में सुखद लगते हैं। कीमत से बड़ा विश्वास है, जिस दुकान या स्रोत से माला लेते हैं वह भरोसेमंद होनी चाहिए। माला को जाप से पहले एक बार गंगाजल या साफ जल से स्पर्श कराकर प्रयोग में लाना शुभ माना गया है।
ध्यान रखने वाली बातें
• जाप के समय माला को ज़मीन पर न रखें, गोद या साफ आसन पर ही रखें।
• माला से जाप बैठकर करें, चलते फिरते जाप की अनुमति ढीली परंपराओं में है, पर एकाग्रता बैठकर ही पूरी होती है।
• गिनती मन में न रखें, माला का काम ही गिनना है। मन का काम है मंत्र के भाव में रहना।
• जाप के बीच में माला न गिनें और आधे जाप पर छोड़कर उठ न जाएँ, यदि कोई अनिवार्य काम आ जाए तो माला को आसन पर रखकर जाएँ।
• एक समय पर एक ही मंत्र का जाप करें, एक ही माला पर कई मंत्र मिलाने की परंपरा नहीं है।
यदि माला उपलब्ध न हो तो अँगुलि गिनती भी परंपरा में स्वीकार्य है। दाएँ हाथ की उँगलियों की गाँठों को अँगूठे से छूकर गिनती की जाती है, जिसे गणना विधि कहते हैं। सफर में या काम के स्थान पर यह तरीका काम आता है। माला के नियमों में शाखा भेद से थोड़ा अंतर मिलता है, अपनी परंपरा के अनुसार चलना ठीक रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: माला को किस उँगली से पकड़ना चाहिए?
उत्तर: माला को बीच वाली उँगली और अँगूठे के बीच रखकर अँगूठे से मनके धकेलने की परंपरा है। तर्जनी उँगली का उपयोग वर्जित माना गया है। यह नियम शुद्धता और एकाग्रता दोनों से जुड़ा बताया गया है।
प्रश्न: क्या एक ही माला से सभी मंत्र जप सकते हैं?
उत्तर: परंपरा में देवता अनुसार माला अलग रखने की सलाह दी गई है, जैसे शिव के लिए रुद्राक्ष और विष्णु के लिए तुलसी। पर सामान्य भक्त के लिए एक माला से इष्ट देव के जाप करना भी स्वीकार्य रहा है। एक समय पर एक ही मंत्र जपना ही उचित है।
प्रश्न: माला ज़मीन पर गिर जाए तो क्या करें?
उत्तर: माला ज़मीन पर गिरने पर उसे उठाकर प्रणाम करें और गंगाजल या साफ जल से स्पर्श करके पुनः उपयोग करें। डोरी टूट जाए तो मनकों को नई डोरी में पिरो लें, इससे माला का महत्व कम नहीं होता।
प्रश्न: माला के बीच का बड़ा मनका क्या कहलाता है?
उत्तर: उसे मेरु, सुमेरु या गुरु मनका कहते हैं। इसे पार नहीं किया जाता, एक चक्कर पूरा होने पर माला उलट दी जाती है। इसे गुरु और ईश्वर तत्व का प्रतीक माना गया है।
प्रश्न: रुद्राक्ष और तुलसी की माला में क्या अंतर है?
उत्तर: रुद्राक्ष की माला भगवान शिव की उपासना से जुड़ी मानी गई है और तुलसी की माला विष्णु, राम और कृष्ण भक्ति की। रुद्राक्ष को जल से स्नान कराया जा सकता है जबकि तुलसी की माला जल से दूर रखी जाती है। दोनों का अपना अलग महत्व और मान्यता है।
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