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करवा चौथ व्रत: पूजा विधि और कथा

2 अक्टूबर 20267 मिनट में पढ़ेंVrat & Upvas
करवा चौथ व्रत: पूजा विधि और कथा

करवा चौथ व्रत की पूजा विधि और कथा जानें। व्रत के नियम, पूजा सामग्री, चाँद देखने की विधि और सरगी की जानकारी।

करवा चौथ विवाहित हिंदू महिलाओं का सबसे प्रसिद्ध व्रत है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सूर्योदय से चंद्रोदय तक महिलाएँ निर्जला व्रत रखती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। पति की दीर्घायु और सुहाग की रक्षा की कामना से यह व्रत जुड़ा है।

यह व्रत उत्तर भारत के साथ पाकिस्तान सहित कई क्षेत्रों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बहूएँ सास के हाथों सरगी खाकर दिन शुरू करती हैं, दिनभर उपवास रहती हैं, शाम को सामूहिक पूजा होती है और रात को चाँद के दर्शनों के बाद व्रत खुलता है। मेहंदी, श्रृंगार और उपहार इस पर्व के रंग हैं।

सरगी और उसकी परंपरा

सरगी वह भोजन है जो सास बहू को सूर्योदय से पहले खिलाती है। इसमें फेनी, दूध, मिठाई, फल और कुछ खाने की चीज़ें होती हैं। बिना पानी पिए पूरा दिन निकालना होता है, इसलिए सुबह का यह भोजन ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। सरगी खाने के बाद दिनभर कुछ नहीं खाया जाता।

जिन घरों में सास नहीं होती, वहाँ माँ या घर की बड़ी महिला सरगी देती है। सरगी के साथ उपहार और वस्त्र भी देने की परंपरा चली आ रही है। सरगी पंजाब की परंपरा का हिस्सा है, जो अब लगभग हर जगह अपना ली गई है।

सरगी खाने के बाद से लेकर चंद्रोदय तक कुछ नहीं खाया जाता, इसलिए यह व्रत दिन भर के लिए एक लंबी परीक्षा होती है। घर के बच्चे और बुज़ुर्ग इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं का हौसला बढ़ाते रहते हैं। सास दिन भर बहू को यही आशीर्वाद देती रहती है कि सारा दिन आसानी से बीते और चाँद जल्दी निकले, यह परंपरा का सुंदर हिस्सा है।

व्रत की विधि

1. सूर्योदय से पहले स्नान करके सरगी ग्रहण करें। इसके बाद दिनभर जल और अन्न का त्याग रखें।

2. दिन में माता की पूजा करें और श्रीकृष्ण या शिव पार्वती की कथा सुनने की परंपरा है। कुछ महिलाएँ मंदिर जाती हैं।

3. दोपहर या सायं करवा चौथ की थाली तैयार करें। थाली में दीपक, रोली, चावल, फूल, मिठाई और पानी का लोटा रखें।

4. करवा यानी मिट्टी का घड़ा जल से भरकर रखें। पूजा में गौरी और शिव, या चंद्रमा की पूजा का विधान है।

5. सामूहिक कथा सुनें या घर पर कथा पढ़ें। कथा में वीरवती की गाथा सुनाई जाती है और व्रत के नियम का स्मरण कराया जाता है।

6. चंद्रोदय की प्रतीक्षा करें। चाँद दिखते ही छलनी या चालनी से चंद्रमा के दर्शन करें, उसे अर्घ्य दें और फिर पति के दर्शन करके उनके हाथ से जल पीकर व्रत खोलें।

वीरवती की कथा

कथा की मुख्य चरित्र रानी वीरवती है, जो अपनी सात बहनों की एकमात्र बहन थी और सात भाई उसके थे। विवाह के बाद एक करवा चौथ पर उसने अपने पतिक्षेत्र में कठोर निर्जला व्रत रखा। दोपहर तक भूख प्यास से व्याकुल भाई दर्द से व्याकुल हो उठे। भाइयों ने एक युक्ति निकाली और दर्पण में अग्नि का प्रतिबिंब दिखाकर कहा कि चाँद निकल आया है, व्रत खोल दो।

बहन के व्रत खोलते ही समाचार आया कि पति स्वस्थ नहीं है। दुखी वीरवती ने पुनः व्रत और पूजा शुरू की, यह कथा श्रद्धा की परीक्षा का प्रतीक बन गई। मान्यता है कि उसकी निष्ठा से पति पुनः स्वस्थ हो गया। कथा का संदेश है कि व्रत के नियमों में से धोखा नहीं खाना चाहिए और श्रद्धा ही सबसे बड़ी शक्ति है।

थाली और पूजा सामग्री

• करवा यानी मिट्टी का घड़ा, जिसमें जल भरकर मौली लपेटी जाती है।

• छलनी या चालनी, जिससे चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं।

• दीपक, रोली, चावल, फूल, धागा और मिठाई से सजी पूजा थाली।

• भोग के लिए मिठाई और फल, जो व्रत खोलने के बाद खाए जाते हैं।

• मेहंदी और श्रृंगार की सामग्री, जो इस पर्व की शोभा है।

करवा चौथ की शाम

साँय के समय महिलाएँ अपनी सजी थाली के साथ एकत्र होती हैं। कई जगह मोहल्ले की सामूहिक पूजा होती है जिसमें एक बुज़ुर्ग महिला कथा पढ़ती है और बाकी सब थाली घुमाती रहती हैं। थाली को घुमाने की इस परंपरा को थाली फेरना कहते हैं, जो कथा के साथ चलती है। दीपक की लौ में एक दूसरे का मुख देखने की भी रीत है।

चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा में बच्चों और बुज़ुर्गों का भी उत्साह देखने लायक होता है। पुरुष भी इस रात अपनी पत्नियों के लिए उपहार लेकर आते हैं, जिसे व्रत खुलने के बाद सौगात कहा जाता है। कुछ परिवारों में व्रत खुलने के बाद विशेष रात्रि भोजन की परंपरा है। मेहंदी वाली रात इस पर्व से एक दिन पहले मनाई जाती है, जो इस उत्सव की शुरुआत मानी जाती है।

व्रत के नियम

व्रत के दिन की शुरुआत से अंत तक महिलाएँ सुहाग के प्रतीकों का ध्यान रखती हैं। मौली, काला धागा, सिंदूर और बिंदी इस दिन की शोभा हैं। सामान्यतः मान्यता है कि व्रत के दिन किसी को दुख न पहुँचाएँ, अपशब्द न बोलें और पति के साथ विशेष स्नेह का व्यवहार रखें। व्रत का भाव निर्हार कर्म से नहीं, भावना से जुड़ा है।

व्रत के दिन महिलाएँ नए वस्त्र और श्रृंगार पहनती हैं, जो सुहाग का प्रतीक माना गया है। सोलह श्रृंगार की परंपरा में बिंदी, बालों में गुंथे फूल, चूड़ियाँ और मेहंदी शामिल हैं। दिनभर माता पार्वती का स्मरण और कथा श्रवण करते रहना व्रत का भाव बनाए रखता है।

अविवाहित कन्याएँ कुछ क्षेत्रों में अपनी मनोकामना या उत्तम वर के लिए यह व्रत रखती हैं, पर प्रचलित परंपरा इसे विवाहित महिलाओं का व्रत मानती है। व्रत के दिन दिनभर जल नहीं पिया जाता, इसलिए जिन महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति नाजुक है, गर्भवती महिलाएँ या बीमार महिलाएँ व्रत न रखें या फलाहार से भाव निभाएँ।

करवा चौथ के चंद्रोदय का समय हर वर्ष और हर शहर में अलग होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से समय देखकर ही व्रत खोलें। क्षेत्रीय परंपराओं में अंतर है, कहीं चाँद के बजाय तारे देखकर व्रत खोलने की परंपरा है और कहीं पूजा का क्रम अलग है। अपनी सास या घर की बड़ी महिलाओं से पूछकर पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: करवा चौथ का व्रत कैसे रखते हैं?

उत्तर: सूर्योदय से पहले सरगी खाकर निर्जला व्रत शुरू करें। दिनभर उपवास रहें, सायं पूजा और कथा करें और चंद्रमा के दर्शनों के बाद अर्घ्य देकर पति के हाथों जल पीकर व्रत खोलें। पूरी विधि में श्रृंगार और मेहंदी का विशेष महत्व है।

प्रश्न: करवा चौथ का व्रत कब खुलता है?

उत्तर: चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खुलता है। छलनी से चाँद देखकर उसे जल और मिठाई का अर्घ्य देते हैं, फिर पति के दर्शन करके उनके हाथ से जल ग्रहण करते हैं। चंद्रोदय का समय पंचांग से देखें क्योंकि यह हर वर्ष बदलता है।

प्रश्न: करवा चौथ की कथा क्या है?

उत्तर: प्रसिद्ध कथा रानी वीरवती की है, जिसके भाइयों ने दर्पण में आग दिखाकर उसे चाँद समझने की भूल कराई और व्रत टूटने से पति को संकट झेलना पड़ा। उसकी पुनः स्थिर श्रद्धा से पति स्वस्थ हुआ। कथा व्रत की निष्ठा का महत्व समझाती है।

प्रश्न: क्या करवा चौथ का व्रत सभी महिलाएँ रख सकती हैं?

उत्तर: परंपरा में यह विवाहित महिलाओं का व्रत है, पर कुछ क्षेत्रों में अविवाहित कन्याएँ भी रखती हैं। गर्भवती, बीमार या स्वास्थ्य से कमजोर महिलाओं को निर्जला व्रत न रखना चाहिए, शास्त्र स्वास्थ्य को व्रत से ऊपर रखते हैं। फलाहार से व्रत का भाव निभाया जा सकता है।

प्रश्न: करवा चौथ में सरगी क्या होती है?

उत्तर: सरगी सूर्योदय से पहले खाया जाने वाला भोजन है जो सास अपनी बहू को देती है। इसमें फेनी, दूध, मिठाई और फल जैसी चीज़ें होती हैं ताकि पूरे दिन के निर्जला व्रत के लिए ऊर्जा मिल जाए। सरगी के साथ उपहार देने की परंपरा भी है।

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