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नवरात्रि में कलश स्थापना की विधि

5 अगस्त 20266 मिनट में पढ़ेंFestivals
नवरात्रि में कलश स्थापना की विधि

नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें? जानें घटस्थापना की विधि, सामग्री, मिट्टी और जौ बोने का तरीका।

नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना यानी घटस्थापना से होती है। प्रतिपदा तिथि के दिन माता भवानी के आवाहन के रूप में कलश स्थापित किया जाता है जो नौ दिन तक पूजा जाता है। कलश को माता का ही स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है, इसलिए यह अनुष्ठान नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण विधान है।

घटस्थापना के साथ अखंड ज्योति की परंपरा भी जुड़ी है, जिसमें कलश के पास एक दीपक नौ दिन तक लगातार जलता रहता है। नौ दिनों तक कलश की पूजा, जौ या गेहूँ के अंकुरण की परंपरा और अंत में विसर्जन, यह पूरा क्रम नवरात्रि साधना का आधार है।

कलश स्थापना की विधि

1. प्रतिपदा के दिन सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ करके आसन बिछाएँ।

2. एक मिट्टी या तांबे का कलश लें और उसमें सात प्रकार की मिट्टी या साधारण शुद्ध मिट्टी की एक परत बिछाएँ।

3. कलश में जल भरें और उसमें गंगाजल, अक्षत, सिक्का, दूब और पाँच प्रकार के फल या अनाज डालें। कुछ परंपराओं में सप्तधान्य डालने का विधान है।

4. कलश के ऊपर जौ या गेहूँ बोएँ। इन्हीं बीजों से नौ दिन में अंकुर निकलते हैं जिन्हें जवारा या कलश की अंकुरित कलियाँ कहते हैं।

5. कलश के मुँह पर आम के पाँच पत्ते रखें और उस पर जल और अक्षत से भरा नारियल रखें। नारियल को लाल वस्त्र या मौली से लपेटें।

6. कलश के सामने दीपक जलाकर माता का आवाहन करें, ध्यान करें और कलश की पूजा करें। नौ दिन तक इसी कलश की पूजा होगी।

घटस्थापना का मुहूर्त

घटस्थापना का सबसे उपयुक्त समय प्रतिपदा तिथि के प्रातः काल का अभिजीत मुहूर्त बताया जाता है। यह मुहूर्त हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से समय देखकर कलश स्थापना करें। प्रातः के समय को सर्वाधिक शुभ माना गया है, क्योंकि सायंकाल स्थापना की अनुमति सामान्यतः नहीं होती।

जिन घरों में प्रातः समय संभव नहीं होता, वे दोपहर के पूर्व किसी शुभ मुहूर्त में स्थापना करते हैं। मुख्य बात यह है कि प्रतिपदा तिथि में ही स्थापना हो। तिथि की पुष्टि के लिए पंचांग अवश्य देखें, क्योंकि कभी कभी तिथि का संक्रमण मध्य रात्रि तक चलता है।

अखंड ज्योति की परंपरा

कलश के पास जलाया जाने वाला दीपक जो नौ दिन तक बुझे नहीं, अखंड ज्योति कहलाता है। इस दीपक को घी या तेल में जलाया जाता है और परिवार के सदस्य बारी बारी से उसकी देखभाल करते हैं ताकि वह बुझे नहीं। बड़े दीपक या अखंड दीप का प्रयोग किया जाता है जिसमें नौ दिन का तेल या घी पहले से डाला जा सके।

अखंड ज्योति की मान्यता यह है कि यह दीपक माता की उपस्थिति का प्रतीक है और इसके बुझने को अशुभ माना गया है। घर के लोग दीपक की बाती साफ करते रहते हैं और तेल या घी की मात्रा का ध्यान रखते हैं। हवा से बचाने के लिए दीपक को ऐसी जगह रखें जहाँ वह सुरक्षित रहे।

जवारा या अंकुरित कलियों की परंपरा

कलश पर बोए गए जौ या गेहूँ नौ दिनों में करीब पाँच छह इंच के अंकुर बन लेते हैं, जिन्हें जवारा कहते हैं। इन अंकुरों को माता की कृपा का प्रतीक माना गया है। नौ दिन तक इन्हें रोज थोड़ा पानी दिया जाता है और इनकी देखभाल की जाती है।

विसर्जन के दिन इन अंकुरों को काटकर माता को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार के सदस्यों में बाँटा जाता है। मान्यता है कि इन अंकुरों को घर में रखने से सुख समृद्धि बनी रहती है। कुछ परिवार इन्हें नदी या पौधों में समर्पित कर देते हैं। अंकुरों का हरापन नई ऊर्जा और जीवन के पुनर्जन्म का प्रतीक माना गया है।

नौ दिनों की पूजा

• रोज सुबह स्नान के बाद कलश की पूजा करें और देवी के स्वरूप का ध्यान करें।

• कलश के जल में रोज थोड़ा ताज़ा जल मिलाते रहें और जवारा को पानी देते रहें।

• संध्या पर दीपक और अगरबत्ती जलाकर आरती करें।

• दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या दुर्गा आरती का पाठ रोज करें।

• अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन और हवन का विधान है, फिर दशमी पर कलश विसर्जन करें।

कलश विसर्जन

नवरात्रि के अंतिम दिन यानी दशमी को विदाई की पूजा करके कलश का विसर्जन किया जाता है। कलश के जल को तुलसी के पौधे में या घर के पौधों में डाला जाता है। जवारा काटकर परिवार में बाँटे जाते हैं या नदी में प्रवाहित किए जाते हैं। कलश को साफ करके सम्मान से रख लिया जाता है।

विसर्जन से पहले माता को विदाई का भोग लगाया जाता है और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना की जाती है। कुछ परिवार विसर्जन के दिन बड़ी पूजा और भोज का आयोजन करते हैं। उपवास रखने वाले लोग इसी दिन व्रत खोलकर उद्यापन करते हैं।

ध्यान रखने वाली बातें

कलश स्थापना के बाद नौ दिनों तक कलश की स्थिरता का ध्यान रखें। कलश जिस जगह स्थापित हुआ है, उसे न खिसकाएँ। कलश का जल सूखने न पाए इसका ध्यान रखें और रोज थोड़ा जल मिलाते रहें। पूजा स्थल की सफाई नौ दिनों तक बनाए रखें।

अखंड ज्योति की देखरेल के लिए घर के लोगों की जिम्मेदारी तय करें। छोटे बच्चों से दीपक की देखभाल न कराएँ। जवारा को धूप में रखें ताकि वे हरे रहें और उनकी लंबाई अच्छी हो। नौ दिनों का यह अनुशासन ही नवरात्रि साधना का सार है।

घटस्थापना की विधि और मुहूर्त हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलते हैं, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें। बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में बोधन की अपनी विधि है, जबकि गुजरात की गरबा परंपरा में कलश के साथ ढोल की महत्ता है। अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि निभाएँ और श्रद्धा को मुख्य रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें?

उत्तर: प्रतिपदा के दिन प्रातः कलश में मिट्टी और जल भरें, उसमें गंगाजल, अक्षत, सिक्का और दूब डालें, ऊपर जौ या गेहूँ बोएँ, आम पत्ते रखकर नारियल रखें और लाल वस्त्र से लपेटें। फिर कलश के सामने दीपक जलाकर माता का आवाहन करें और पूजा करें।

प्रश्न: कलश स्थापना का सही समय क्या है?

उत्तर: प्रतिपदा तिथि के प्रातः काल का अभिजीत मुहूर्त घटस्थापना के लिए सबसे शुभ माना जाता है। यह मुहूर्त हर वर्ष बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से समय देखें। सायंकाल स्थापना सामान्यतः वर्जित मानी गई है, दोपहर से पहले स्थापना श्रेष्ठ है।

प्रश्न: कलश में क्या डालते हैं?

उत्तर: कलश में पहले सात प्रकार की मिट्टी या शुद्ध मिट्टी बिछाते हैं, फिर जल भरकर उसमें गंगाजल, अक्षत, सिक्का, दूब और अनाज या फल डालते हैं। ऊपर जौ बोकर आम पत्तों पर नारियल रखते हैं जिसे लाल वस्त्र या मौली से लपेटा जाता है। हर वस्तु का अपना प्रतीक है।

प्रश्न: अखंड ज्योति क्या है?

उत्तर: कलश के पास जलाया जाने वाला वह दीपक जो नवरात्रि के नौ दिन तक लगातार जलता रहता है, अखंड ज्योति कहलाता है। इसे बुझने से बचाने के लिए परिवार के सदस्य बारी बारी से तेल या घी डालते और बाती साफ करते रहते हैं। इसे माता की उपस्थिति का प्रतीक माना गया है।

प्रश्न: कलश का विसर्जन किस दिन करते हैं?

उत्तर: नवरात्रि के अंतिम दिन यानी दशमी तिथि पर विदाई की पूजा करके कलश का विसर्जन किया जाता है। कलश का जल पौधों में डाला जाता है, जवारा काटकर बाँटे जाते हैं या नदी में प्रवाहित किए जाते हैं और कलश को सम्मान से रख लिया जाता है।

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