Festivals

दिवाली पूजा की संपूर्ण विधि

9 अगस्त 20267 मिनट में पढ़ेंFestivals
दिवाली पूजा की संपूर्ण विधि

दिवाली पूजा की संपूर्ण विधि जानें। लक्ष्मी गणेश पूजा का क्रम, सामग्री, मुहूर्त की जानकारी और नियम सरल हिंदी में।

दिवाली या दीपावली भारत का सबसे बड़ा त्योहार है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात घर घर दीये जलाए जाते हैं और माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा होती है। राम जी के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापसी के उपलक्ष्य में अयोध्यावासियों ने दीये जलाए थे, इसी परंपरा को दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

दिवाली की तैयारी दिनों पहले शुरू हो जाती है। घर की सफाई, रंगोली, दीयों की खरीदी, मिठाइयाँ और उपहार, यह सब इस पर्व का हिस्सा है। पाँच दिन के उत्सव का क्रम धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर समाप्त होता है, जिसकी मुख्य रात लक्ष्मी पूजा की है। यहाँ पूरी पूजा विधि दी गई है।

पाँच दिनों का क्रम

दिनपर्वविशेष
पहलाधनतेरसधन खरीदी और यमराज दीप
दूसरानरक चतुर्दशीअभ्यंग स्नान और छोटी दिवाली
तीसरादिवालीलक्ष्मी गणेश पूजा और दीपदान
चौथागोवर्धन पूजागोवर्धन पर्वत की पूजा और अन्नकूट
पाँचवाँभाई दूजभाई बहन का पर्व

लक्ष्मी पूजा की विधि

1. दिवाली की शाम स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। पूरे घर की सफाई पहले ही पूरी कर लें, माता लक्ष्मी को स्वच्छता प्रिय माना गया है।

2. पूजा स्थल पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। कुछ परिवारों में सरस्वती और कुबेर की भी पूजा होती है।

3. कलश स्थापना करें और भगवान गणेश की पहले पूजा करें, फिर माता लक्ष्मी की पूजा करें।

4. लक्ष्मी जी को जल, रोली, चावल, चंदन, कमल या लाल पुष्प, दूर्वा, अबीर गुलाल और मिठाई अर्पित करें।

5. सोना चाँदी या धन की पूजा करें, तिजोरी और बही खाते की पूजा की परंपरा व्यापारिक परिवारों में है।

6. लक्ष्मी जी के सामने घी के दीपक जलाएँ और लक्ष्मी आरती गाएँ। प्रसाद बाँटें और घर के सभी द्वारों पर दीये रखें।

पूजा का मुख्य मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

अर्थ: हे महालक्ष्मी माता, आपको नमन। लक्ष्मी पूजा का प्रचलित जाप मंत्र।

लक्ष्मी पूजन का शुभ समय

दिवाली की रात लक्ष्मी पूजन का शुभ समय प्रदोष काल में बताया जाता है, जो हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलता है। प्रदोष काल की विशेष मान्यता इसलिए है कि यह समय स्थिर लक्ष्मी की उपासना के लिए उत्तम माना गया है। इसलिए पूजा का समय स्थानीय पंचांग से देखकर तय करें।

कुछ परिवार महानिशा काल में भी पूजा की परंपरा निभाते हैं। समय की दृष्टि से मुख्य बात यह है कि पूरी श्रद्धा और संयम से पूजा करें। अगर निर्धारित समय में पूजा नहीं हो पाती तो रात्रि में किसी भी शुभ मुहूर्त में माता का स्मरण करके पूजा कर लेना परंपरा में स्वीकार्य रहा है।

दीपदान की परंपरा

दीपावली की तैयारी में बच्चों को शामिल करना इस पर्व की सबसे सुंदर परंपरा है। बच्चों के साथ मिलकर रंगोली बनाना, दीये रंगना और उन्हें सजाना परिवार के लिए साझा स्मृति बन जाता है। त्योहारों की यही साझा तैयारी बच्चों को परंपरा से जोड़ती है और घर का वातावरण उत्सव से भर देती है।

दीपावली का अर्थ ही दीयों की पंक्ति है। इस रात घर के मुख्य द्वार, आँगन, छत, रंगोली के बीच और गली मोहल्ले तक दीये जलाए जाते हैं। मान्यता है कि माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर उसी घर में प्रवेश करती हैं जहाँ प्रकाश और स्वच्छता हो।

मिट्टी के दीयों में घी या तिल के तेल की बाती लगाकर जलाने की परंपरा प्रचलित है। दीयों की संख्या घर की श्रद्धा के अनुसार रखी जाती है। आज पटाखों के स्थान पर दीयों और फानुसों से घर सजाने की परंपरा बढ़ रही है, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों की दृष्टि से श्रेष्ठ है। बच्चों के साथ मिलकर दीये रखना इस पर्व का सबसे सुंदर अनुभव है।

दिवाली से जुड़ी मान्यताएँ

• मान्यता है कि लक्ष्मी पूजा के दिन घर की सफाई और दीपक की रोशनी से माता लक्ष्मी का आगमन होता है।

• राम जी की अयोध्या वापसी के उपलक्ष्य में दीये जलाने की परंपरा दीपावली का मूल आधार है।

• व्यापारिक परिवारों में नए बही खाते की पूजा और चौपाई पूजन की परंपरा है।

• जैन परंपरा में महावीर स्वामी के निर्वाण के उपलक्ष्य में दीपावली मनाई जाती है।

• सिख परंपरा में गुरु हरगोबिंद जी की अमृतसर वापसी के उपलक्ष्य में बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है।

पूजा की सामग्री

लक्ष्मी पूजा की सामग्री में कलश, नारियल, आम पत्ते, रोली, चावल, चंदन, कमल गट्टे, लाल पुष्प, दूर्वा, अबीर गुलाल, मिठाई, दूध दही, शहद और घी के दीपक शामिल हैं। सोने चाँदी के आभूषणों की पूजा करने की परंपरा भी है। बही खाता, तिजोरी और व्यापार के सामान की पूजा व्यापारियों के घर होती है।

रंगोली बनाना दिवाली की शोभा है। घर के द्वार पर रंगोली और उसके बीच दीया रखने की परंपरा है। आँगन में फुटपाथ तक सफाई करके दीयों की कतार लगाई जाती है। मान्यता है कि रंगोली माता लक्ष्मी के स्वागत का संकेत है।

ध्यान रखने वाली बातें

पूजा के समय पूरे परिवार के साथ बैठें और आरती के बाद बड़ों का आशीर्वाद लें। पटाखों के प्रति सावधानी रखें, बच्चों की देखरेख करें और संभव हो तो हरित दिवाली मनाएँ। दीयों को ऐसी जगह रखें जहाँ आग न लगने पाए।

मिठाइयों और उपहारों की तैयारी में शुद्धता का ध्यान रखें। प्रसाद का सम्मान करें। इस पर्व पर गरीबों को दान करने की परंपरा है, दीये, अन्न या वस्त्र का दान दीपावली की शोभा बढ़ाता है। अपने नौकर चाकरों और सहयोगियों को इस पर्व पर उपहार देने की परंपरा भी रही है।

लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त और प्रदोष काल का समय हर वर्ष और हर शहर में अलग होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें। दक्षिण भारत में नरक चतुर्दशी की महत्ता अलग है और गुजरात में विक्रम संवत के नए वर्ष की शुरुआत दिवाली के अगले दिन से होती है। अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार पर्व मनाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: दिवाली की पूजा कैसे करते हैं?

उत्तर: शाम स्नान के बाद लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें, कलश रखें, पहले गणेश पूजा करें, फिर लक्ष्मी जी को जल, रोली, चावल, चंदन, पुष्प और मिठाई अर्पित करें। घी के दीपक जलाकर आरती करें और घर के सभी द्वारों पर दीये रखें।

प्रश्न: लक्ष्मी पूजा का सही समय क्या है?

उत्तर: दिवाली की रात प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन का शुभ समय बताया जाता है। यह समय हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से समय देखकर पूजा करें। रात्रि में महानिशा काल की भी परंपरा है।

प्रश्न: दिवाली पर किन देवताओं की पूजा होती है?

उत्तर: दिवाली पर मुख्य रूप से माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा होती है। कुछ परिवारों में सरस्वती और कुबेर की भी पूजा होती है। व्यापारिक परिवारों में बही खाते और तिजोरी की पूजा की परंपरा है। गोवर्धन पूजा में गोवर्धन पर्वत की पूजा होती है।

प्रश्न: दिवाली क्यों मनाते हैं?

उत्तर: प्रचलित मान्यता के अनुसार श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीये जलाकर स्वागत किया था, उसी की स्मृति में दीपावली मनाई जाती है। जैन और सिख परंपराओं में इस दिन के अपने ऐतिहासिक महत्व हैं। रात्रि को अमावस्या के अंधेरे को दीयों से मिटाना इस पर्व का प्रतीकात्मक संदेश है।

प्रश्न: दिवाली की रात कितने दीये जलाते हैं?

उत्तर: दीयों की संख्या की कोई कठोर बाध्यता नहीं है, श्रद्धा के अनुसार जितने संभव हो जलाएँ। घर के मुख्य द्वार, आँगन, पूजा स्थल, रंगोली के बीच और छत पर दीये रखे जाते हैं। मुख्य द्वार पर रंगोली के बीच दीये की परंपरा विशेष है। प्रकाश जितना अधिक, शुभता उतनी बढ़ती है।

संबंधित आलेख

इस आलेख के साथ ये आलेख भी पढ़ें और आपस में जोड़ें:

• धनतेरस पूजा विधि और महत्व (dhanteras-puja)

• पूजा में दीपक किस दिशा में रखें? (deepak-kis-disha-mein)

• वरलक्ष्मी व्रत की पूजा विधि और महत्व (varlakshmi-vrat)

दिवाली की पूजा विधि, सही समय और लक्ष्मी पूजा से जुड़ी सारी जानकारी Sanatan Seva app के त्योहार सेक्शन में मिलती है। त्योहारों की तिथि और मुहूर्त की सूचना भी app समय पर देती है, जिससे कोई पूजा छूटे नहीं।

ऐसे ही और आध्यात्मिक लेख Sanatan Seva ऐप में पढ़ें
सभी लेखों पर वापस जाएँ