
पूजा में दीपक किस दिशा में रखें? जानें दीपक की दिशा, तेल या घी का दीपक शुभ कब माना जाता है और दीपक से जुड़े नियम।
पूजा में दीपक की दिशा का अपना महत्व बताया गया है। दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं, वह तेज और शुभता का प्रतीक माना गया है, इसलिए उसे रखने की दिशा पर परंपरा में ध्यान दिया गया है। घर के मंदिर में दीपक को सामान्यतः दाईं ओर रखने की परंपरा सर्वाधिक प्रचलित है।
दीपक की दिशा के साथ उसके प्रकार की बात भी जुड़ी है। घी का दीपक और तेल का दीपक अलग अलग कामनाओं से जोड़े गए हैं। बत्ती की दिशा, दीपक का स्थान और जलाने का समय, इन तीनों का ध्यान रखने से पूजा की परंपरा पूरी मानी जाती है। यहाँ वे सभी बातें सरल भाषा में दी गई हैं।
दीपक की दिशा
घर के मंदिर में दीपक को भगवान के दाईं ओर रखने की परंपरा सबसे व्यापक है। दाहिनी ओर को शुभ पक्ष माना गया है, इसीलिए दीपक और पूजा की मुख्य सामग्री दाईं ओर रखी जाती है। बत्ती की लौ की दिशा को लेकर मान्यता है कि लौ पूर्व या उत्तर की ओर रहे तो शुभ माना जाता है।
घर के मुख्य द्वार पर जलाए जाने वाले दीपक को बाहर की ओर रखा जाता है, ताकि रोशनी बाहर की ओर जाए। रंगोली के बीच दीपक रखने की परंपरा दीपावली और कार्तिक मास में होती है। तुलसी के नीचे का दीपक शाम के समय जलाया जाता है और उसे घर की देहरी के पास रखना शुभ माना गया है।
घी या तेल का दीपक
| दीपक | मान्यता |
|---|---|
| घी का दीपक | शुभ कार्यों, पूजा और संध्या के लिए श्रेष्ठ माना गया |
| तेल का दीपक | शनि संबंधी उपायों और मुख्य द्वार की रोशनी के लिए प्रचलित |
| पंचमुखी दीपक | विशेष पूजाओं में पाँच लौओं वाले दीपक का विधान |
| सरसों के तेल का दीपक | हनुमान जी की पूजा में प्रचलित मान्यता |
| चमेली के तेल का दीपक | हनुमान उपासना की परंपरा में विशेष स्थान |
पूजा में घी के दीपक को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। घी को सात्विक द्रव्य बताया गया है और उसकी लौ को शुभता का प्रतीक माना गया है। तेल का दीपक शनिवार की पूजा और घर के बाहर की रोशनी के लिए प्रचलित है। दोनों का अपना अलग स्थान है और दोनों को अपनी परंपरा के अनुसार जलाया जाता है।
दीपक जलाने का समय
सुबह की पूजा में दीपक भगवान को जल अर्पित करने के बाद जलाया जाता है और शाम की पूजा में सूर्यास्त के समय। संध्या के दीपक को सूर्यास्त के ठीक साथ जलाना शुभ माना गया है। कार्तिक मास में तो सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय दीपक जलाने की विशेष परंपरा है, जिसे दीपदान कहते हैं।
दीप जलाने के बाद उसे बुझाने की हड़बड़ी न करें। दीपक की बाती को हाथ से न बुझाएँ, परंपरा में इसे अशुभ माना गया है। दीपक स्वयं बुझ जाए तो ठीक है, अन्यथा दीपक की थाली हटाने के बाद बाती को पलटकर या दीपक को ढककर विश्राम दिया जाता है। इन छोटी बातों में परंपरा का सम्मान समाया हुआ है।
दीपक से जुड़ी मान्यताएँ
• मान्यता है कि रोज शाम के दीपक से घर में सुख समृद्धि बनी रहती है।
• दीपक की लौ को प्रत्यक्ष देवता का प्रतीक मानकर उसके आगे हाथ जोड़ते हैं।
• तुलसी के नीचे दीपक जलाने से विशेष पुण्य की प्राप्ति बताई गई है।
• आरती के दीपक का प्रसाद सबसे पहले घर के बड़ों को दिया जाता है।
• अमावस्या और पूर्णिमा की शाम के दीपक का विशेष महत्व बताया गया है।
दीपावली और कार्तिक की परंपरा
कार्तिक मास की इसी परंपरा को घर की दिनचर्या में शामिल करना आसान है। शाम के दीपक के लिए एक तय जगह बना लें, जैसे घर के द्वार का एक कोना या तुलसी के पास का स्थान। रोज उसी जगह दीपक रखने से आदत बन जाती है और घर के सदस्यों को भी याद रहता है। दीपक के लिए माचिस या लाइटर और बाती की रुई पास में ही रखें, ताकि व्यस्तता में भी छोटी सी परंपरा न छूटे।
दीपावली की रात घर के हर कोने में दीपक जलाने की परंपरा है। मुख्य द्वार से लेकर छत, रंगोली के बीच और आँगन तक दीयों की कतार लगती है। मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर उसी घर में प्रवेश करती हैं जहाँ स्वच्छता और दीपक की रोशनी हो।
कार्तिक मास में दीपदान की विशेष परंपरा है। इस मास में रोज सुबह और शाम तुलसी के नीचे और घर के द्वार पर दीपक जलाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली मनाई जाती है, जिसमें काशी के घाटों पर लाखों दीपक जलाए जाते हैं। गंगा के घाटों पर दीपदान की परंपरा इसी मास की शोभा है।
दीपक की सावधानियाँ
दीपक जलाते समय सावधानी भी उतनी ही जरूरी है। दीपक को ऐसी जगह रखें जहाँ बच्चों की पहुँच न हो और हवा से लौ बुझने का खतरा न हो। पर्दों और कपड़ों से दूर रखें। दीपक के नीचे एक थाली या प्लेट रखें ताकि घी या तेल फैले नहीं।
बाती के लिए रुई का उपयोग करें और उसे दीपक के किनारे से सही दिशा में रखें। बाती एक बार में जल जाए और बार बार बुझे तो उसे बदल लें। दीपक को रोज साफ करें, पीतल के दीपक को समय समय पर चमकाएँ। दीपक की साफ सफाई पूजा की शुद्धता का हिस्सा मानी गई है।
दीपक की दिशा को लेकर परंपराओं में मतभेद रहा है, कहीं दाईं ओर की बात है और कहीं लौ की दिशा को महत्व दिया गया है। वास्तु की दृष्टि से भी अलग बातें मिलती हैं। अपने घर की परंपरा के अनुसार दीपक रखें और श्रद्धा का ध्यान रखें, दीपक का असली विधान भाव है। विशेष उपायों के लिए ज्योतिषी या आचार्य से पूछकर दिशा तय करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: पूजा में दीपक किस दिशा में रखें?
उत्तर: घर के मंदिर में दीपक भगवान के दाईं ओर रखने की परंपरा सर्वाधिक प्रचलित है। बत्ती की लौ पूर्व या उत्तर दिशा में रहे तो शुभ माना जाता है। मुख्य द्वार का दीपक बाहर की ओर रखा जाता है ताकि रोशनी बाहर दिखे।
प्रश्न: दीपक में घी जलाएँ या तेल?
उत्तर: पूजा और शुभ कार्यों के लिए घी का दीपक श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि घी को सात्विक द्रव्य बताया गया है। तेल का दीपक शनि संबंधी उपायों और घर के बाहर की रोशनी के लिए प्रचलित है। हनुमान जी की पूजा में चमेली या सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है।
प्रश्न: क्या शाम को दीपक जलाना जरूरी है?
उत्तर: संध्या के समय दीपक जलाने की परंपरा को बहुत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद रहता है। रोज शाम के दीपक की यह छोटी परंपरा अनेक घरों में निभाई जाती है।
प्रश्न: दीपक की बाती को हाथ से क्यों नहीं बुझाते?
उत्तर: परंपरा में दीपक की लौ को तेज का देव स्वरूप माना गया है, इसलिए उसे हाथ से बुझाना अशुभ माना गया है। दीपक को अपने आप बुझने दें या पूजा समाप्त होने पर सम्मानपूर्वक विश्राम दें। फूँक मारकर बुझाने से भी बचा जाता है।
प्रश्न: तुलसी के नीचे दीपक कब जलाते हैं?
उत्तर: तुलसी के नीचे शाम के समय दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे विशेष शुभ माना गया है। कार्तिक मास में तो सुबह और शाम दोनों समय तुलसी के नीचे दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है।
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