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भगवान को भोग लगाने की सही विधि

14 सितंबर 20267 मिनट में पढ़ेंPuja Vidhi
भगवान को भोग लगाने की सही विधि

भगवान को भोग लगाने की सही विधि जानें। क्या भोग लगाएं, कौन सी चीज़ें न चढ़ाएं और भोग के बाद प्रसाद के नियम।

भगवान को भोग लगाना भारतीय घरों की रोज की परंपरा है। पका हुआ भोजन, फल, मिठाई या सिर्फ जल और तुलसी दल, जो भी अर्पित किया जाए, वह भोग कहलाता है। भोग लगाने के बाद वही वस्तु प्रसाद बन जाती है और घर के सदस्यों में बाँटी जाती है। यह छोटी सी परंपरा भक्ति का उतना ही अंग है जितना पूजा और आरती।

भोग का मूल भाव समर्पण है। जो कुछ हम खाते हैं, उसका पहला अंश भगवान को अर्पित करना यह मानकर कि यह सब उसी की दी हुई वस्तु है, यही भोग की सार्थकता बताई गई है। शास्त्रों में अर्पण की इस भावना को अहंकार के घटाने और संतोष की वृद्धि से जोड़ा गया है।

भोग की विधि

1. पूजा और जाप के बाद भोग लगाने का क्रम आता है। भोग पूजा के अंत में अर्पित किया जाता है।

2. भोग की थाली में जो भी अर्पित करना है, स्वच्छ बर्तन में साफ जगह पर रखें। भोग ताज़ा और शुद्ध होना चाहिए।

3. भोग के साथ जल का एक पात्र और तुलसी दल रखें। तुलसी के बिना भोग अधूरा माना गया है।

4. मंत्र बोलकर भगवान को भोग का निवेदन करें और कुछ क्षण आँखें बंद करके प्रार्थना करें।

5. कुछ देर बाद भोग हटाकर प्रसाद के रूप में बाँटें। पहले घर के बड़ों को, फिर बच्चों को और फिर स्वयं ग्रहण करें।

6. प्रसाद को सम्मान से ग्रहण करें और उसे बर्बाद न होने दें। बचा हुआ प्रसाद पशु पक्षियों को दे दें।

भोग निवेदन का मंत्र

नमो आद्य हरय श्रीपद्मनाभाय। अनेकैर्दूरैः स्थितेऽस्मि यत्तु त्वं सर्वज्ञः परमेश्वरः।

अर्थ: हे सर्वज्ञ परमेश्वर, भोग निवेदन का सामान्य भाव यह है कि हे प्रभु, यह भोग आपके चरणों में समर्पित है, इसे स्वीकार करें और प्रसाद रूप में कृपा करें।

घरों में सरल भाषा में निवेदन की परंपरा भी चलती है, जैसे हाथ जोड़कर कहना कि प्रभु यह भोग आपके चरणों में है, कृपा करके स्वीकार करें। भाव की भाषा से बड़ा मंत्र का उच्चारण नहीं माना गया, पर विधिवत पूजा में संस्कृत निवेदन मंत्र का प्रचलन है। देवालयों में पुरोहित द्वारा भोग का विस्तृत निवेदन होता है।

क्या चढ़ाएँ और क्या नहीं

भोग में वही अर्पित करें जो सात्विक और शुद्ध हो। फल, मिठाई, खीर, हलवा, पकवान, गुड़, दूध, मक्खन, पंचामृत और घर में बना सात्विक भोजन भोग में चढ़ाए जाते हैं। प्रसाद की परंपरा में चोला भोग, साबुत अन्न और 56 भोग का विधान विशेष पूजाओं में है।

• प्याज़ लहसुन से बना भोजन नैवेद्य में सामान्यतः नहीं चढ़ाया जाता।

• बासी या बिगड़ी हुई वस्तु कभी भोग में न चढ़ाएँ, ताज़ापन भोग की शर्त है।

• जो चीज़ आप स्वयं नहीं खाएँगे, वह भोग में न रखें, यह भक्ति का सामान्य नियम है।

• मांसाहारी वस्तुएँ और मद्य सनातन पूजा परंपरा में भोग के लिए पूर्णतः वर्जित हैं।

• नमक वाले भोग की परंपरा क्षेत्र अनुसार अलग है, जो अधिकांश परिवारों में मीठे भोग की परंपरा प्रचलित है।

छप्पन भोग की परंपरा

बड़ी पूजाओं और विशेष अवसरों पर 56 वस्तुओं का भोग लगाने की परंपरा है, जिसे छप्पन भोग कहते हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयाँ, फल, दूध से बनी वस्तुएँ, अनाज के व्यंजन और पेय शामिल होते हैं। ठाकुर जी की परंपरा में छप्पन भोग का विशेष स्थान है, जो भगवान को सबसे प्रिय वस्तुओं के समर्पण का प्रतीक बना।

छप्पन भोग की सूची परंपरा और स्थान के अनुसार बदलती है। कहीं अन्न कुटीर से लेकर मिठाइयों तक 56 प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं, कहीं संक्षिप्त रूप में कम वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। भाव की दृष्टि से 56 की संख्या भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की इच्छा का प्रतीक बनी है। घरों में विशेष तिथियों पर जितनी वस्तुएँ बन सकें उतने भोग से भी परंपरा पूरी मानी जाती है।

प्रसाद का महत्व

भोग के बाद अर्पित वस्तु प्रसाद बन जाती है और प्रसाद को भगवान की कृपा का रूप माना गया है। प्रसाद बाँटने से घर में मिठास और भाईचारा बना रहता है। बड़े तीर्थों और मंदिरों के प्रसाद की अपनी महिमा बताई जाती है, जैसे तिरुपति का लड्डू और शबरीमाला का अप्पम।

प्रसाद की परंपरा में कुछ नियम भी जुड़े हैं। प्रसाद को पैरों से नहीं छुआ जाता, उसे फेंका नहीं जाता और उसे अपशिष्ट करने से बचा जाता है। बचा हुआ प्रसाद गाय, कुत्ते या पक्षियों को दे दिया जाता है, जिससे वह अन्न के रूप में सम्मान पाता है। यह छोटे नियम बच्चों को अन्न का सम्मान सिखाने का भी माध्यम बने हैं।

भोग लगाने का सही समय

रोज की पूजा में जो भी भोग लगाया जाए, उसकी मात्रा थोड़ी ही होनी चाहिए। भगवान को अधिक मात्रा में भोग लगाकर उसे बर्बाद करना उचित नहीं माना गया। एक छोटी कटोरी मिठाई, एक फल या थोड़ा पान प्रसाद पूरे भाव के साथ अर्पित किया जा सकता है। भोग का महत्व भाव में है, मात्रा में नहीं।

रोज की पूजा में भोग का समय पूजा के अंत में आता है। सुबह की पूजा में नाश्ते की वस्तु या मिठाई और शाम की आरती के बाद थोड़ा भोग लगाने की परंपरा है। बड़े मंदिरों में दिन में कई बार भोग का क्रम होता है, जैसे मंगला आरती के बाद, राजभोग में दोपहर का विस्तृत भोग और शयन आरती से पहले रात्रि का भोग।

घरों में यह क्रम सरल रूप में चलता है। व्रत और त्योहारों के दिन भोग की सूची बड़ी हो जाती है। जन्माष्टमी पर माखन मिश्री, शिवरात्रि पर भांग धतूरे का भाव, गणेश चतुर्थी पर मोदक और नवरात्रि में हलवा पूरी का भोग प्रचलित है। भोग की वस्तु इष्ट देव की परंपरा से तय होती है।

भोग की परंपरा में सामाजिक और क्षेत्रीय अंतर रहता है। बंगाल की भोग परंपरा में विस्तृत रसोई होती है, उत्तर भारत के ठाकुरों में छप्पन भोग प्रचलित है और दक्षिण में नैवेद्य का अपना क्रम है। अपने घर और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भोग लगाएँ। विशेष पूजा के भोग की विधि जाननी हो तो पुरोहित से पूछ लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: भगवान को भोग कैसे लगाते हैं?

उत्तर: पूजा और जाप के बाद स्वच्छ बर्तन में ताज़ा शुद्ध वस्तु रखकर, साथ में जल और तुलसी दल रखकर हाथ जोड़कर निवेदन करें। कुछ क्षण प्रार्थना करके भोग हटाएँ और प्रसाद के रूप में बाँटें। भोग पूजा का अंतिम चरण होता है।

प्रश्न: भगवान को क्या भोग नहीं लगाते?

उत्तर: प्याज़ लहसुन से बना भोजन, बासी या बिगड़ी वस्तुएँ, मांसाहार और मद्य भोग में वर्जित मानी गई हैं। जो वस्तु स्वयं ग्रहण करने योग्य न हो, वह भगवान को अर्पित नहीं की जाती। भोग में शुद्धता और ताज़ापन की शर्त रहती है।

प्रश्न: भोग में तुलसी क्यों रखते हैं?

उत्तर: तुलसी को भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय माना गया है और बिना तुलसी दल के भोग अधूरा माना गया है। मान्यता है कि तुलसी दल से भोग का निवेदन भगवान अवश्य स्वीकार करते हैं। शिव और गणेश की पूजा में तुलसी की जगह बेलपत्र और दूर्वा की परंपरा है।

प्रश्न: छप्पन भोग में क्या होता है?

उत्तर: छप्पन भोग में 56 प्रकार की वस्तुओं का भोग लगाया जाता है, जिसमें पकवान, मिठाइयाँ, फल, दूध की वस्तुएँ, अनाज के व्यंजन और पेय शामिल होते हैं। ठाकुर जी की परंपरा में इसका विशेष स्थान है। सूची परंपरा और स्थान के अनुसार बदलती रहती है।

प्रश्न: भोग और प्रसाद में क्या अंतर है?

उत्तर: भोग वह वस्तु है जो भगवान को अर्पित की जाती है और प्रसाद वही वस्तु भोग लगाने के बाद की अवस्था में कहलाती है। भोग अर्पण की वस्तु है और प्रसाद भगवान की कृपा के रूप में वापस मिलने वाली वस्तु है। दोनों एक ही परंपरा के दो पहलू हैं।

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