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आरती करने की विधि और महत्व

8 सितंबर 20267 मिनट में पढ़ेंPuja Vidhi
आरती करने की विधि और महत्व

आरती करने की सही विधि और महत्व जानें। आरती का क्रम, दीपक घुमाने का तरीका और आरती के बाद के नियम।

आरती पूजा का सबसे भावपूर्ण और सबसे लोकप्रिय अंग है। दीपक को भगवान के सामने घुमाना, घंटी बजाना, भजन गाना और प्रसाद बाँटना, इस पूरे क्रम को आरती कहते हैं। सुबह और शाम की पूजा का समापन आरती से होता है और हर मंदिर में दिन में कई बार आरती की परंपरा चलती है।

आरती का शाब्दिक अर्थ है वह जो अंतर्द्वार से ईश्वर तक पहुँचे। कुछ विद्वान इसे आरात्रिक कहते हैं, यानी रात्रि के अंत में होने वाला वह क्रम जिसमें भगवान को विश्राम की प्रार्थना की जाती है। समय के साथ आरती पूजा की परिणति का सामान्य नाम बन गई। भाव की दृष्टि से आरती वह क्षण है जब भक्त अपने पूरे अस्तित्व से भगवान के सामने झुक जाता है।

आरती की विधि

1. पूजा और भोग के बाद आरती का क्रम आता है। आरती की थाली में जलता हुआ दीपक, धूप, पंखा, जल का पात्र, फूल और प्रसाद रखें।

2. दीपक में घी की एक से पाँच बातियाँ रखें। घंटी बजाते हुए आरती का भजन शुरू करें।

3. दीपक की थाली को भगवान के सामने धीरे धीरे घुमाएँ। तीन बार नीचे की ओर, तीन बार ऊपर की ओर या चारों ओर वृत्ताकार घुमाने की परंपरा है।

4. धूप और पंखा भी भगवान के सामने घुमाएँ। घंटी या ताल की ताल पर आरती का भजन गाते रहें।

5. आरती समाप्त होने पर जल का पात्र सबके हाथ में देकर थाली के ऊपर से झुककर दर्शन कराएँ।

6. प्रसाद और फूल सबके बीच बाँटें। घंटी बजाकर पूजा का समापन करें।

सबसे प्रचलित आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

अर्थ: हे जगत के स्वामी जगदीश की जय हो, जो भक्तों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं। यह आरती लगभग हर देवता की पूजा में गाई जाती है।

इसके अलावा हर देवता की अपनी प्रचलित आरतियाँ हैं। शिव जी की जय शिव ओंकारा, हनुमान जी की आरती, गणेश जी की सुखकर्ता दुखहर्ता, दुर्गा माता की आरती, लक्ष्मी जी की आरती और कृष्ण जी की आरती घरों और मंदिरों में गाई जाती हैं। जो लोग साथ गाना नहीं जानते, वे सुनते हुए और ताली बजाते हुए आरती में शामिल हो सकते हैं।

आरती में दीपक क्यों घुमाते हैं

दीपक को भगवान के सामने घुमाने की परंपरा के पीछे सुंदर भाव है। दीपक तेज का प्रतीक है और उसे भगवान के सामने घुमाने का अर्थ है कि मेरा तेज, मेरा जीवन और मेरी सारी ऊर्जा आपको समर्पित है। वृत्ताकार घुमाव उस पूर्णता का संकेत है जिसमें भक्त अपने आप को पूरी तरह झुका देता है।

आरती के दीपक को अपनी आँखों से छूकर देखने और माथे से लगाने की परंपरा है। भक्त आरती के दीपक की ऊर्जा को अपने भीतर ग्रहण करने का भाव रखता है। आरती के अंत में जल की थोड़ी मात्रा हाथ में लेकर उसे आँखों और मस्तक पर लगाने की रीत है, जो शुद्धि का संकेत है।

आरती का महत्व

• आरती पूजा की परिणति है, उसके बिना पूजा का समापन अधूरा माना गया है।

• घंटी और ताल की ध्वनि से मन की एकाग्रता बढ़ती है, ऐसी मान्यता है।

• सामूहिक आरती से परिवार और समाज में भाईचारा बढ़ता है।

• आरती का प्रसाद घर के हर सदस्य तक पहुँचाने की परंपरा है।

• मंदिरों की संध्या आरती का वातावरण भक्ति का जीता जागता अनुभव देता है।

मंदिरों की आरतियाँ

बड़े मंदिरों में दिन भर में कई आरतियाँ होती हैं। मंगला आरती भोर में भगवान के जागरण के साथ, शृंगार आरती सजे हुए स्वरूप के दर्शन के समय, राजभोग आरती दोपहर के भोग के समय, संध्या आरती शाम के समय और शयन आरती रात के विश्राम से पहले। हर आरती का अपना भाव और अपनी परंपरा है।

मंदिरों की संध्या आरती का अपना ही आकर्षण है। घंटियों की गूँज, शंख की ध्वनि, बड़े दीपकों की पंचप्रदीप आरती और भक्तों का सहभागिता से भरा गायन, यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाता है जो स्वयं को भुलाकर पूर्ण समर्पण में डुबो देता है। वाराणसी की गंगा आरती तो देश विदेश में अपनी पहचान रखती है, जिसे देखने दूर दूर से लोग आते हैं।

घर पर आरती कैसे करें

घर की आरती में भव्य साज सामान की जरूरत नहीं होती। एक छोटी थाली, एक दीपक, अगरबत्ती, घंटी और थोड़ा प्रसाद इसके लिए पर्याप्त है। परिवार के सदस्य मिलकर आरती गाएँ तो उसका आनंद दोगुना हो जाता है। बच्चों को घंटी बजाने और ताली देने की जिम्मेदारी दें।

जो लोग अकेले रहते हैं, वे अपने मंदिर के सामने खड़े होकर या बैठकर आरती कर सकते हैं। आरती का भजन चलाकर सुनना भी परंपरा में स्वीकार्य है। व्रतों और त्योहारों के दिन आरती का विस्तार बढ़ाया जा सकता है। रोज की आरती में सादगी और विशेष दिनों में विस्तार, यही घर की परंपरा का संतुलन है।

ध्यान रखने वाली बातें

आरती करते समय कुछ छोटी बातों का ध्यान रखना शिष्ट माना गया है। थाली को भगवान के सामने इस तरह रखें कि दीपक की लौ स्थिर रहे। आरती जल्दबाज़ी में न करें, भजन की लय के साथ थाली घुमाएँ। आरती के बाद दीपक को बुझाने की हड़बड़ी न करें और थाली को सम्मान से रखें।

आरती का प्रसाद सबको देने की परंपरा है, उसे छोड़ना या फेंकना उचित नहीं माना गया। आरती के जल को पीया जाता है या मस्तक पर लगाया जाता है। ये छोटे नियम आरती के भाव को सम्मान देते हैं। बड़े दीपकों के साथ आरती करते समय आग से सावधानी रखें और बच्चों की देखरेख रखें।

आरती की विधि और उसके भजन परिवार, संप्रदाय और क्षेत्र के अनुसार अलग हैं। उत्तर भारत में ॐ जय जगदीश हरे सबसे प्रचलित है, दक्षिण में दीपाराधना की अपनी परंपरा है और बंगाल में आरती के अपने भजन हैं। अपने घर की परंपरा के अनुसार आरती करें और भाव को मुख्य रखें। विशेष पूजाओं की आरती के लिए पुरोहित से विधि पूछ लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: आरती कैसे करते हैं?

उत्तर: आरती की थाली में जलता दीपक, धूप, पंखा, जल और प्रसाद रखें। घंटी बजाते हुए भजन गाएँ और दीपक की थाली को भगवान के सामने वृत्ताकार धीरे धीरे घुमाएँ। अंत में जल और प्रसाद सबको देकर पूजा समाप्त करें। आरती पूजा का अंतिम क्रम है।

प्रश्न: आरती में दीपक को कितनी बार घुमाते हैं?

उत्तर: परंपरा में दीपक की थाली को तीन बार नीचे की ओर और तीन बार ऊपर की ओर या सात बार वृत्ताकार घुमाने की रीत है, जो क्षेत्र अनुसार बदलती है। भजन की लय के साथ थाली घुमाना मुख्य बात है। धीरे और भावपूर्ण ढंग से घुमाएँ।

प्रश्न: आरती का प्रसाद कैसे लेते हैं?

उत्तर: आरती के बाद जल की थोड़ी मात्रा हथेली में लेकर आँखों और मस्तक पर लगाते हैं या पीते हैं। फिर थाली के ऊपर से झुककर दीपक के दर्शन करते हैं। प्रसाद हाथ में लेकर बाद में ग्रहण करते हैं। प्रसाद को सम्मान से लेने की परंपरा है।

प्रश्न: सबसे प्रचलित आरती कौन सी है?

उत्तर: ॐ जय जगदीश हरे की आरती सबसे प्रचलित है, जिसे लगभग हर देवता की पूजा में गाया जाता है। इसके अलावा शिव जी की जय शिव ओंकारा, हनुमान आरती, गणेश आरती सुखकर्ता दुखहर्ता और दुर्गा आरती घरों में गाई जाती हैं। इष्ट देव की आरती चुनने की परंपरा है।

प्रश्न: आरती में घंटी क्यों बजाते हैं?

उत्तर: घंटी की ध्वनि को मन को एकाग्र करने और वातावरण को शुद्ध करने वाली माना गया है। आरती के समय घंटी या ताल बजाने से भजन की लय बनती है और सामूहिक भाव जागता है। शास्त्रों में घंटी की ध्वनि को देवताओं के आवाहन का संकेत भी कहा गया है।

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