
मंत्र जाप 108 बार क्यों किया जाता है? जानें 108 संख्या का धार्मिक महत्व, माला के 108 मनकों की परंपरा और जाप की परंपरा की बातें।
माला उठाकर जाप करने वाला हर व्यक्ति एक सवाल जरूर पूछता है कि आखिर 108 ही क्यों। जाप की संख्या चुनने में इतनी ज़िद क्यों है। सीधा उत्तर यह है कि 108 को सनातन परंपरा में पूर्ण संख्या माना गया है। माला के मनके भी इसी गिनती के हिसाब से रखे गए हैं, ताकि जाप करते समय गिनने की चिंता न रहे और मन मंत्र में लगा रहे।
यह संख्या किसी एक ग्रंथ की देन नहीं है। वेद, पुराण, ज्योतिष और योग परंपरा में 108 को अलग अलग दृष्टियों से पूर्ण बताया गया है। जितनी व्याख्याएँ हैं, उन सबका सार एक ही निकलता है कि 108 पूर्णता का प्रतीक है, इसीलिए जाप की इकाई यही बनाई गई।
माला के 108 मनके क्यों हैं
इस सवाल का सीधा जवाब यह है कि माला के मनके जाप की पूर्ण संख्या के हिसाब से रखे गए हैं। एक चक्कर पूरा करने पर साधक को पूर्णता का भाव मिलता है और गिनती की चिंता खत्म हो जाती है। अगर माला में अलग अलग संख्या में मनके होते, तो हर माला पर गिनना पड़ता और जाप का मूल उद्देश्य भटक जाता। यानी माला और 108 की संख्या एक दूसरे के पूरक हैं।
भारतीय ज्योतिष में 27 नक्षत्र बताए गए हैं और हर नक्षत्र के चार चरण यानी पद होते हैं। 27 को 4 से गुणा करने पर 108 बनता है। यानी पूरे आकाश के नक्षत्रों के सारे चरणों की गिनती 108 में समा जाती है। इसी तरह 12 राशियों और 9 ग्रहों का गुणनफल भी 108 ही बनता है, जो व्यक्ति के जीवन पर असर डालने वाली मुख्य ज्योतिषीय शक्तियों का प्रतीक माना गया है।
सूर्य और पृथ्वी की दूरी का अनुपात भी कहा जाता है कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 108 गुना है, वहीं चंद्रमा का व्यास भी इसी के आसपास का अनुपात रखता है। यह संयोग भारतीय चिंतन को 108 की पवित्रता का एक और आधार देता है। साफ है कि यह संख्या आकाश, पृथ्वी और काल तीनों से जुड़ी है।
शास्त्रों और परंपरा की दृष्टि
• 108 उपनिषदों की परंपरा प्रचलित है, जिन्हें वेदों का सार कहा गया है।
• संस्कृत वर्णमाला में 54 अक्षर होते हैं, हर अक्षर का शिव और शक्ति रूप मानकर दो गिनती की गई तो 108 बनता है।
• योग परंपरा में मानव शरीर में 108 नाड़ियों के संकेत मिलते हैं जो हृदय की ओर जाती हैं, इसलिए 108 बार जाप से ऊर्जा का पूर्ण चक्र माना गया।
• शिव जी के नामों की गिनती और विष्णु सहस्रनाम जैसे स्तोत्रों की परंपरा भी 108 के आसपास की संख्याओं में गुंफी है।
• माला के 108 मनकों के साथ एक बड़ा मनका रखने की परंपरा है, जिसे मेरु या सुमेरु कहते हैं।
एक माला गिनी जाती है सौ
जाप की परंपरा में एक रोचक नियम यह भी है कि 108 मनकों की एक माला को गिनती में सौ माना जाता है। कारण बताया गया है कि जाप करते समय मन कहीं न कहीं भटक ही जाता है, कुछ उच्चारण ध्यान के बिना निकल जाते हैं। उस गिनती की भरपाई के लिए आठ अतिरिक्त मनके माने गए हैं। यानी 100 का लक्ष्य पूरा करने के लिए 108 का इंतज़ाम रखा गया।
इसी तरह बीच का मेरु मनका पार नहीं किया जाता। एक चक्कर पूरा होने पर माला को उलट दिया जाता है, यानी वही मनका जिस पर आए थे उसी पर लौटना शुरू कर दिया जाता है। मेरु को गुरु या ईश्वर का प्रतीक माना गया है, जिस पर पैर नहीं रखा जाता।
संख्या और उनका महत्व
| संख्या | परंपरा में महत्व |
|---|---|
| 1 | एक बार श्रद्धापूर्वक स्मरण, जिसकी मान्यता सर्वोच्च बताई गई |
| 11 | छोटे अनुष्ठानों और रोज के जाप की प्रचलित संख्या |
| 21 | सूर्य अर्घ्य और हनुमान जाप की प्रचलित संख्या |
| 27 | एक चौथाई माला, नक्षत्रों से जुड़ी मानी गई |
| 54 | आधी माला, गुरुवार विष्णु जाप की परंपरा में प्रचलित |
| 108 | पूर्ण संख्या, एक माला यानी पूर्ण चक्र |
108 के पीछे की एक और सीधी सोच
इतनी सारी व्याख्याओं के बाद एक बात और समझनी चाहिए। जाप की इकाई तय करने का एक सीधा कारण यह भी है कि साधना में माप की जरूरत होती है। बिना तय गिनती के जाप करने वाला व्यक्ति कभी जल्दी में छोड़ देगा, कभी आलस में कम कर लेगा। 108 का नियम एक ऐसा मापदंड देता है जो आज की भाषा में लक्ष्य जैसा है। जिस दिन पूरी माला हो जाए, उस दिन की साधना पूर्ण हुई मान ली जाती है।
यही अनुशासन लंबे साधकों के अनुभव में सबसे कीमती सिद्ध हुआ है। माला उठाने से पहले मन करता है कि आज बहुत देर हो गई, कल से शुरू करेंगे। पर एक बार माला शुरू करने के बाद वही मन चार पाँच मनकों पर लय में आ जाता है। 108 यानी सोचने से बड़ा लगने वाला, पर करने पर निपट जाने वाला आकार। प्राचीन ऋषियों ने शायद यही संतुलन चुना होगा।
शुरुआत करने वालों के लिए
108 की संख्या सुनकर शुरुआत करने वाले डर जाते हैं कि इतना लंबा जाप कौन करेगा। सच यह है कि एक माला का जाप धीरे धीरे बोलने पर भी 10 से 15 मिनट में हो जाता है। पहले दिन 11 बार जाप से शुरुआत करें, फिर 21 और 27 पर आगे बढ़ें। जब मंत्र ज़ुबान पर बैठ जाए, एक पूरी माला का जाप अपने आप आसान लगने लगेगा।
यह भी याद रखें कि जाप का उद्देश्य गिनती भरना नहीं है। भटकते मन से बोले गए हजार जाप से एकाग्र मन से बोला गया एक स्मरण बेहतर माना गया है। संख्या का काम अनुशासन बनाए रखना है, जैसे साँस की गति बनी रहती है। गिनती छोड़कर भाव पर चले जाना ही जाप की सार्थकता है।
आज के समय में कई लोग मोबाइल ऐप के जाप काउंटर से गिनती रखते हैं, जो माला उपलब्ध न होने पर एक व्यावहारिक विकल्प है। परंपरा माला को मानसिक स्थिरता का सहारा मानती है, क्योंकि मनकों को छूने की क्रिया ध्यान को बार बाल वापस लाती रहती है। दोनों का उद्देश्य एक ही है, जाप को निरंतर रखना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: माला में 108 मनके क्यों होते हैं?
उत्तर: 108 को सनातन परंपरा में पूर्ण संख्या माना गया है। 27 नक्षत्रों के चार चरण और 12 राशियों के 9 ग्रहों से जुड़ी यह गिनती जाप की इकाई बनाई गई, ताकि एक चक्कर में पूर्णता का भाव समा जाए।
प्रश्न: क्या जाप 108 से कम संख्या में कर सकते हैं?
उत्तर: जी हाँ, 11, 21, 27 और 54 की संख्या में जाप की परंपरा प्रचलित है। शुरुआत करने वालों के लिए छोटी संख्या से शुरू करना ही बेहतर माना गया है। संख्या से बड़ा भाव और नियमितता का महत्व है।
प्रश्न: माला का आखिरी मनका क्यों नहीं पार करते?
उत्तर: माला के बीच के बड़े मनके को मेरु या गुरु मनका कहते हैं और इसे ईश्वर या गुरु तत्व का प्रतीक माना गया है। एक चक्कर पूरा होने पर माला उलट दी जाती है, यही शिष्ट परंपरा मानी गई है।
प्रश्न: 108 की संख्या विज्ञान से कैसे जुड़ी है?
उत्तर: सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 108 गुना माना जाता है, यह एक प्रसिद्ध खगोलीय संयोग है। योग परंपरा में शरीर की 108 नाड़ियों का उल्लेख मिलता है। ये संयोग प्राचीन ऋषियों के आकाश के निरीक्षण की गहराई दिखाते हैं।
प्रश्न: बिना गिनती के जाप करने का क्या फल है?
उत्तर: जाप का मूल उद्देश्य मन को मंत्र में जोड़ना है, गिनती केवल अनुशासन का साधन है। नाम स्मरण की परंपरा में बिना गिनती के भक्ति भाव से जपना सदा प्रचलित रहा है। श्रद्धा से किया गया हर स्मरण मूल्यवान माना गया है।
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