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Bhagavad Gita · Adhyay 9
राजविद्या राजगुह्य योग
34 श्लोक, Raja Vidya Raja Guhya Yoga

अध्याय का सार
सबसे गोपनीय राज-विद्या, भगवान सब लोकों के स्वामी हैं, फिर भी अनन्य-भक्तों के रक्षक हैं। समस्त यज्ञ-तप के फल भी उन्हें ही प्राप्त होते हैं। जो अनन्य भाव से उनकी शरण में आता है: चाहे पापी हो, वह वैष्णव कहलाता है और शीघ्र शांति पाता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां, अनन्य भक्ति की शक्ति
- योगक्षेमं वहाम्यहम्, भक्त का योगक्षेम भगवान वहन करते हैं
- पापी को भी शरणागति मुक्त करती है
अध्याय 9 — सम्पूर्ण श्लोक (34)
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प्रतिनिधि श्लोक
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
Ananyashchintayanto mam ye janah paryupasate
जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन कर मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
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