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Bhagavad Gita · Adhyay 16
दैवासुर सम्पद विभाग योग
24 श्लोक, Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

अध्याय का सार
दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) संपदा का विभाग। दैवी संपदा, अभय, सत्य, दान, यज्ञ, तप, अहिंसा, मुक्ति का मार्ग; आसुरी संपदा, दंभ, अहंकार, क्रोध, अहिंसा का अभाव, बंधन का मार्ग। शास्त्र-विधि के अनुसार चलना ही श्रेष्ठ है।
मुख्य शिक्षाएँ
- दैवी संपदा वर्तते मुक्ताय, दिव्य गुण मुक्ति देते हैं
- शास्त्र को प्रमाण मानकर कर्म करें
अध्याय 16 — सम्पूर्ण श्लोक (24)
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प्रतिनिधि श्लोक
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
Abhayam sattvasamshuddhir jnanayogavyavasthitih
अभय, चित्त-शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय और तप, ये दैवी संपदा है।
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Aaj ka Bhakti Vichar
मन के वश में करना ही सबसे बड़ी तपस्या है।
ॐ नमः शिवाय
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