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खाटू श्याम जी

Bhakti · Kalyan · Ashaखाटू ग्राम (राजस्थान)फाल्गुन मेला, निश्चय द्वादशी
खाटू श्याम जी

खाटू श्याम जी

खाटू श्याम जी

स्कंद पुराण की परंपरा के अनुसार बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उनकी माता का नाम मौर्वी बताया जाता है, जिन्हें कुछ कथाओं में कामकंटका भी कहा गया है। बचपन से ही वे असाधारण योद्धा थे। उन्होंने देवी की उपासना की और उन्हें तीन अमोघ बाण मिले। इसी कारण उनका एक नाम तीन बाण धारी पड़ा।

इन तीन बाणों में एक सब निशानों को चिह्नित करता था, दूसरा चिह्नित चीजों को नष्ट कर देता था और तीसरा बाण चिह्नित वस्तुओं को छोड़कर बाकी सब पर प्रहार करता था। कहा जाता है कि इन बाणों से वे अकेले ही पूरी सेना का अंत कर सकते थे। उनका घोड़ा नीले रंग का बताया जाता है, इसलिए उन्हें लीले का असवार भी कहा जाता है।

मंत्र

श्री श्याम देवाय नमः

खाटू नरेश को नमन — लीला पुरुषोत्तम।

खाटू श्याम जी की कथा और खाटू धाम यात्रा

बर्बरीक कौन थे

स्कंद पुराण की परंपरा के अनुसार बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उनकी माता का नाम मौर्वी बताया जाता है, जिन्हें कुछ कथाओं में कामकंटका भी कहा गया है। बचपन से ही वे असाधारण योद्धा थे। उन्होंने देवी की उपासना की और उन्हें तीन अमोघ बाण मिले। इसी कारण उनका एक नाम तीन बाण धारी पड़ा।

इन तीन बाणों में एक सब निशानों को चिह्नित करता था, दूसरा चिह्नित चीजों को नष्ट कर देता था और तीसरा बाण चिह्नित वस्तुओं को छोड़कर बाकी सब पर प्रहार करता था। कहा जाता है कि इन बाणों से वे अकेले ही पूरी सेना का अंत कर सकते थे। उनका घोड़ा नीले रंग का बताया जाता है, इसलिए उन्हें लीले का असवार भी कहा जाता है।

हारे का सहारा क्यों कहलाए

बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया था कि वे युद्ध में हमेशा कमजोर पक्ष की तरफ से लड़ेंगे। कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले जब वे रणभूमि की ओर चले तो कृष्ण को चिंता हुई। युद्ध में कौरव संख्या में ज्यादा थे, इसलिए पांडव कमजोर पक्ष थे और बर्बरीक पांडवों की ओर से उतरते। लेकिन जैसे जैसे पांडव जीतते, कौरव कमजोर पड़ते और बर्बरीक को पाला बदलना पड़ता। इस तरह युद्ध कभी खत्म नहीं होता।

यही वचन उन्हें आगे चलकर हारे का सहारा बना देता है।

कृष्ण की परीक्षा

कथा में आता है कि कृष्ण ब्राह्मण का वेश बनाकर बर्बरीक के सामने आए और पूछा कि इतने कम बाणों से वे युद्ध कैसे जीतेंगे। बर्बरीक ने कहा कि एक बाण ही काफी है। कृष्ण ने उन्हें सामने खड़े पीपल के पेड़ के सारे पत्तों को एक बाण से बींधने की चुनौती दी। बर्बरीक ने बाण छोड़ा। उसने सारे पत्ते भेद दिए। पर एक पत्ता कृष्ण ने चुपके से अपने पैर के नीचे छिपा लिया था। बाण उनके पैर के चारों ओर घूमने लगा, क्योंकि उसे वह पत्ता भी भेदना था।

तब कृष्ण समझ गए कि यह योद्धा अकेले युद्ध का फैसला पलट सकता है।

शीश दान की कथा

कृष्ण ने ब्राह्मण के रूप में बर्बरीक से दान मांगा। बर्बरीक ने वचन दिया कि जो मांगोगे वही दूंगा। कृष्ण ने उनका शीश मांग लिया। बर्बरीक पल भर को चौंके, फिर समझ गए कि सामने कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने कृष्ण से असली रूप दिखाने को कहा। कृष्ण ने अपने दर्शन दिए और बताया कि युद्ध शुरू होने से पहले रणभूमि की पूजा के लिए एक श्रेष्ठ क्षत्रिय की बलि आवश्यक होती है, और इसके लिए बर्बरीक से योग्य कोई नहीं।

बर्बरीक ने खुशी से शीश दान किया। उनकी एक ही इच्छा थी कि वे पूरा युद्ध देख सकें। कृष्ण ने उनका शीश एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से पूरा कुरुक्षेत्र दिखता था।

युद्ध के बाद पांडव आपस में बहस करने लगे कि जीत का श्रेय किसे जाए। तब बर्बरीक के शीश ने कहा कि उन्होंने सिर्फ कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलते देखा और द्रौपदी को महाकाली के रूप में रक्त पीते देखा। जीत का असली कारण कृष्ण हैं।

प्रसन्न होकर कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में तुम मेरे नाम श्याम से पूजे जाओगे। इसी वजह से बर्बरीक को श्याम बाबा कहा जाता है।

खाटू में शीश कैसे मिला

स्थानीय परंपरा के अनुसार शीश खाटू गांव की धरती में मिला। कहा जाता है कि एक गाय एक खास स्थान पर रोज अपने आप दूध की धार छोड़ती थी। जब उस जगह खुदाई हुई तो शीश निकला। कथा के अनुसार उस समय के शासक रूप सिंह चौहान को स्वप्न में मंदिर बनवाने का आदेश मिला। मंदिर की स्थापना की तिथि और बाद के जीर्णोद्धार को लेकर अलग अलग बातें कही जाती हैं, इसलिए इन्हें परंपरा के रूप में ही लिखना ठीक है। कुछ और जगहों पर भी बर्बरीक की कथा के अपने स्थानीय ब्योरे मिलते हैं।

खाटू श्याम जी की पूजा और परंपराएं

एकादशी: हर महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर खाटू में विशेष भीड़ रहती है।

फाल्गुन मेला: फाल्गुन मास में लगने वाला मेला सबसे बड़ा माना जाता है। इसमें दूर दूर से पैदल यात्री निशान लेकर आते हैं।

निशान: नारियल लगी ध्वजा, जिसे भक्त मंदिर में अर्पित करते हैं।

श्याम कुंड: मान्यता है कि यहीं से शीश प्रकट हुआ था। परंपरा में यहां स्नान का महत्व बताया गया है।

भोग: चूरमा और मावे की मिठाइयों का भोग लोकप्रिय है।

मंत्र के रूप में लोग ॐ श्री श्याम देवाय नमः या केवल जय श्री श्याम का जप करते हैं।

यात्रा के लिए व्यावहारिक बातें

खाटू धाम जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन रिंगस जंक्शन है, जो खाटू से करीब 17 किलोमीटर पर है। एकादशी और फाल्गुन मेले के दिनों में लाइन में कई घंटे लग सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों के साथ जा रहे हों तो भीड़ वाले दिनों से बचें।

ध्यान दें: मंदिर के खुलने का समय, आरती का समय, दर्शन की व्यवस्था और किसी भी तरह के नियम बदलते रहते हैं। प्रकाशित करने से पहले मंदिर समिति की आधिकारिक सूचना से जांच लें। इस लेख में समय जानबूझकर नहीं दिया गया है।

कृष्ण की कथा में रुचि हो तो बांके बिहारी जी का लेख भी पढ़ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

खाटू श्याम जी कौन हैं?

मान्यता के अनुसार महाभारत के वीर योद्धा बर्बरीक, जिन्हें कृष्ण से कलियुग में श्याम नाम से पूजे जाने का वरदान मिला।

बर्बरीक ने शीश दान क्यों किया?

कथा के अनुसार कृष्ण ने उनसे दान में शीश मांगा, और युद्ध से पहले रणभूमि की पूजा के लिए एक श्रेष्ठ क्षत्रिय का बलिदान आवश्यक बताया।

खाटू श्याम जी को हारे का सहारा क्यों कहते हैं?

क्योंकि बर्बरीक ने कमजोर पक्ष की ओर से लड़ने का वचन दिया था।

खाटू धाम कहां है?

राजस्थान के सीकर जिले में खाटू गांव में।

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