
जगन्नाथ जी
जगन्नाथ जी
जगन्नाथ का अर्थ है जगत के नाथ। उन्हें कृष्ण का रूप माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में तीन विग्रह हैं: जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा। साथ में सुदर्शन भी विराजमान हैं। मूर्तियां लकड़ी की हैं, बड़ी गोल आंखों वाली, और हाथ पैर पूरे दिखाई नहीं देते। यह रूप पहली बार देखने वाले को अलग लगता है, इसलिए लोग इसके पीछे की कथा जानना चाहते हैं।
पुरी चार धामों में से एक है। बाकी तीन बदरीनाथ, द्वारका और रामेश्वरम हैं।
मंत्र
ॐ जगन्नाथाय नमः
हे जगन्नाथ, आपको नमस्कार।
जगन्नाथ पुरी: रथ यात्रा और महाप्रसाद की परंपरा
जगन्नाथ जी का स्वरूप
जगन्नाथ का अर्थ है जगत के नाथ। उन्हें कृष्ण का रूप माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में तीन विग्रह हैं: जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा। साथ में सुदर्शन भी विराजमान हैं। मूर्तियां लकड़ी की हैं, बड़ी गोल आंखों वाली, और हाथ पैर पूरे दिखाई नहीं देते। यह रूप पहली बार देखने वाले को अलग लगता है, इसलिए लोग इसके पीछे की कथा जानना चाहते हैं।
पुरी चार धामों में से एक है। बाकी तीन बदरीनाथ, द्वारका और रामेश्वरम हैं।
अधूरी मूर्ति की कथा
स्कंद पुराण और उड़िया परंपरा की कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान नीलमाधव की खोज की। एक मान्यता है कि समुद्र में तैरता एक विशाल लकड़ी का लट्ठा, जिसे दारु ब्रह्म कहा गया, उन्हें मिला। उसी से मूर्ति बनाने का काम शुरू हुआ। देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा एक बूढ़े कारीगर के रूप में आए। उन्होंने शर्त रखी कि जब तक वे काम पूरा न कर लें, कोई कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
कई दिनों तक भीतर से औजारों की आवाज आती रही। फिर आवाज बंद हो गई। रानी चिंतित हो गईं कि कारीगर कुछ खा पी नहीं रहा। राजा ने दरवाजा खुलवाया। भीतर कोई नहीं था और तीनों मूर्तियां अधूरी थीं। हाथ पैर पूरे नहीं बने थे। राजा दुखी हुए तो दैवीय वाणी हुई कि इसी रूप में पूजा करो।
यह एक कथा है। जनजातीय परंपराओं में नीलमाधव को शबर समुदाय के देवता के रूप में भी बताया जाता है। अलग अलग स्रोतों में कई रूप मिलते हैं।
नवकलेवर
हर कुछ वर्षों में, जिस साल आषाढ़ में दो महीने की अधिकता यानी अधिक मास पड़ता है, मूर्तियां बदली जाती हैं। इस परंपरा को नवकलेवर कहते हैं, यानी नया शरीर। पुराने विग्रह को मंदिर परिसर में समाधि दी जाती है और नीम की खास लकड़ी से नए बनाए जाते हैं। कथा है कि पुराने विग्रह में कृष्ण का ब्रह्म पदार्थ होता है जिसे नए विग्रह में पहुंचाया जाता है। इसका ब्योरा बहुत गोपनीय रखा जाता है।
रथ यात्रा की परंपरा
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होती है, यानी जून या जुलाई में। तारीख पंचांग से देखें।
तीन रथ: जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। हर साल ये रथ नई लकड़ी से बनाए जाते हैं।
छेरा पहरा: यात्रा से पहले पुरी के गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथ के आगे का मार्ग बुहारते हैं। भगवान के सामने राजा भी सेवक है, यह इस रस्म का भाव है।
गुंडिचा मंदिर: रथ लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं, जिसे भगवान की मौसी का घर कहा जाता है। वहां वे लगभग नौ दिन रहते हैं।
बाहुड़ा यात्रा: नौ दिन बाद वापसी की यात्रा होती है।
एक दिलचस्प बात यह है कि कृष्ण और बलराम की मथुरा यात्रा की स्मृति भी इस उत्सव से जोड़ी जाती है। विदेशी भाषा में Juggernaut शब्द इसी जगन्नाथ से बना है।
महाप्रसाद की परंपरा
पुरी का प्रसाद आम प्रसाद से अलग माना जाता है। मंदिर की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी रसोइयों में गिना जाता है। खाना मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की आग पर पकता है। लोक मान्यता है कि बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं और ऊपर वाले बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है। बर्तन हर दिन नए इस्तेमाल होते हैं।
भगवान को भोग लगाने के बाद वही भोजन आनंद बाजार में बिकता है। परंपरा कहती है कि महाप्रसाद पाने में जाति या ऊंच नीच का भेद नहीं होता। लोग एक ही पंगत में बैठकर या एक दूसरे के हाथ से प्रसाद लेते हैं। सामान्य भोग को छप्पन भोग भी कहा जाता है, जिसमें कई तरह के अन्न, दाल, सब्जी और मिठाइयां शामिल होती हैं।
यात्रा से पहले
पुरी में समुद्र तट, कोणार्क का सूर्य मंदिर और चिल्का झील भी लोग साथ में देखते हैं। कोणार्क की चर्चा हमारे सूर्य देव वाले लेख में भी है।
ध्यान दें: जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश के नियम, दर्शन का समय, मोबाइल और बैग के नियम और रथ यात्रा के दिनों की व्यवस्था प्रशासन द्वारा तय होती है और बदलती रहती है। मंदिर में केवल हिंदू धर्म को मानने वालों के प्रवेश की परंपरा रही है। प्रकाशित करने से पहले श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) की आधिकारिक साइट से सारी जानकारी जांच लें। इस लेख में जानबूझकर समय नहीं लिखा गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जगन्नाथ जी की मूर्ति अधूरी क्यों है?
प्रचलित कथा में कारीगर के काम के बीच दरवाजा खुलवा देने से मूर्ति अधूरी रह गई। इसी रूप में आज भी पूजा होती है।
रथ यात्रा में भगवान कहां जाते हैं?
मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक, जिसे मौसी का घर कहा जाता है।
जगन्नाथ और कृष्ण में क्या संबंध है?
परंपरा में जगन्नाथ को कृष्ण का ही रूप माना गया है। राधा रानी और बांके बिहारी वाले लेखों में कृष्ण भक्ति के दूसरे रूप देख सकते हैं।
महाप्रसाद को इतना खास क्यों कहते हैं?
क्योंकि यह मंदिर की रसोई में विशेष विधि से पकता है, भगवान को अर्पित होता है और सबको बिना भेदभाव के मिलता है।
मंत्र
पूजा विधि
आरती और भजन
