
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध) के अनुसार भू-भार से त्रस्त पृथ्वी ने ब्रह्मा जी के माध्यम से विष्णु से शरण माँगी। कंस-आदि दुरात्माओं के अत्याचार से धरती पर धर्म का ह्रास हो गया था। भगवान विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे देवकी के गर्भ से अवतरित होकर कंस का अंत करेंगे। देवकी-वसुदेव का विवाह वसुदेव की बहन कंस से हुआ था, यह विवाह-यात्रा के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ गर्भ कंस के लिए मृत्यु का कारण बनेगा।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध) के अनुसार भू-भार से त्रस्त पृथ्वी ने ब्रह्मा जी के माध्यम से विष्णु से शरण माँगी। कंस-आदि दुरात्माओं के अत्याचार से धरती पर धर्म का ह्रास हो गया था। भगवान विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे देवकी के गर्भ से अवतरित होकर कंस का अंत करेंगे। देवकी-वसुदेव का विवाह वसुदेव की बहन कंस से हुआ था, यह विवाह-यात्रा के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ गर्भ कंस के लिए मृत्यु का कारण बनेगा।
आकाशवाणी सुनते ही कंस ने देवकी का वध करना चाहा। वसुदेव ने उसे समझाया कि उनकी संतान ही कंस की मृत्यु का कारण बनेगी, अतः उसे देवकी के प्रत्येक नवजात कंस को सौंप देंगे। कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया तथा देवकी की प्रत्येक संतान का उसी समय वध कर दिया जाता था। इस प्रकार छह संतानें नष्ट हुईं; सातवीं संतान (बलराम) का संक्रमण रोहिणी के गर्भ में हुआ।
आठवीं संतान के जन्म की रात्रि कारागार में अद्भुत घटनाएँ घटित हुईं, कारागार दिव्य प्रकाश से भर गया, द्वार स्वतः खुल गए, पहरेदार निद्रा में डूब गए तथा शंख-ध्वनि के साथ विष्णु-स्वरूप शिशु ने चतुर्भुज रूप दर्शाकर वसुदेव को नंद-यशोदा के गोकुल ले जाने का निर्देश दिया तथा वहाँ से यशोदा की नवजात कन्या को लाने को कहा। वसुदेव ने नवजात शिशु को मंगल-परात में रखकर गोकुल की ओर प्रस्थान किया, मार्ग में उफनती यमुना ने शिशु के चरणों का जल-स्पर्श होते ही बाट दिया तथा शेषनाग छत्र की भाँति वर्षा से रक्षा करता रहा।
गोकुल में वसुदेव ने नंद-भवन के नवजात कन्या-शिशु के स्थान पर आँदोल में शिशु को रखा तथा कन्या को लेकर कारागार लौट आए। कंस को समाचार मिला तो वह कारागार में दौड़ा आया तथा कन्या को पत्थर से आघात कर मारना चाहा। कन्या उसके हाथ से उड़कर देवी महामाया-रूप में खड़ी हो गई तथा उसने घोषणा की, 'हे कंस, तेरा वध करने वाला तो जन्म ले चुका है, वह गोकुल में कहीं विद्यमान है।' भयभीत कंस ने पुत्रनना (जन्म-दिवस) आयोजित कर समस्त शिशुओं के वध का आदेश दिया तथा राज-सीमा में पूतना जैसे दैत्यों से शिशु-कृष्ण का वध करवाना चाहा, पूतना स्तन-विष देने आई, कृष्ण ने उसका प्राण भी पी लिया।
गोकुल में यशोदा-नंद के ललने-पलने शिशु ने बाल-लीलाएँ कीं, शकट-भंजन, तृणावर्त-वध, यमलार्जुन वृक्ष उखाड़ना, कालिय-मर्दन, गोवर्धन-धारण तथा माखन-चोरी की मुस्कान भरी लीलाएँ। मथुरा में युग के अंत पर कृष्ण ने कंस-वध कर माता-पिता को मुक्त किया तथा उग्रसेन को राजसिंहासन दिया। जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में बालगोपाल का अभिषेक-पूजा इसी दिव्य जन्म की स्मृति है, जो भक्त इस रात्रि जागरण-व्रत से व्यतीत करते हैं, उन्हें वासुदेव-कृपा से संसार के समस्त सुख एवं अंत में मोक्ष प्राप्त होता है, यह भागवत-परंपरा का निष्कर्ष है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
