
बांके बिहारी जी
बांके बिहारी जी
बांके का अर्थ है टेढ़ा या मुड़ा हुआ। यहां ठाकुर जी की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, यानी तीन जगह से झुकी हुई, गर्दन, कमर और घुटने। बिहारी का मतलब है विहार करने वाला या लीला करने वाला। इस तरह नाम का भाव हुआ, तीन जगह से मुड़कर खड़े लीलाधारी कृष्ण।
परंपरा के अनुसार संगीत सम्राट तानसेन के गुरु माने जाने वाले स्वामी हरिदास वृंदावन में निधिवन के पास साधना करते थे। वे भजन गाते और कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर राधा कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए। भक्तों के आग्रह पर स्वामी जी ने प्रार्थना की कि यह रूप सबको दिखे। मान्यता है कि तब राधा कृष्ण एक ही विग्रह में समा गए। वह विग्रह मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को प्रकट हुआ। उसी दिन को बिहार पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
मंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हे कृष्ण, आपको हरे-हरे नमन।
बांके बिहारी मंदिर वृंदावन: दर्शन की परंपरा
बांके बिहारी नाम का अर्थ
बांके का अर्थ है टेढ़ा या मुड़ा हुआ। यहां ठाकुर जी की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, यानी तीन जगह से झुकी हुई, गर्दन, कमर और घुटने। बिहारी का मतलब है विहार करने वाला या लीला करने वाला। इस तरह नाम का भाव हुआ, तीन जगह से मुड़कर खड़े लीलाधारी कृष्ण।
स्वामी हरिदास और मूर्ति के प्रकट होने की कथा
परंपरा के अनुसार संगीत सम्राट तानसेन के गुरु माने जाने वाले स्वामी हरिदास वृंदावन में निधिवन के पास साधना करते थे। वे भजन गाते और कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर राधा कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए। भक्तों के आग्रह पर स्वामी जी ने प्रार्थना की कि यह रूप सबको दिखे। मान्यता है कि तब राधा कृष्ण एक ही विग्रह में समा गए। वह विग्रह मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को प्रकट हुआ। उसी दिन को बिहार पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
यह कथा भक्त परंपरा में मान्य है। इतिहासकार और स्थानीय सेवायत समुदाय कुछ ब्योरों पर अलग राय रखते हैं, इसलिए इसे श्रद्धा की कथा के रूप में पढ़ना ठीक है।
दर्शन में पर्दा क्यों डाला जाता है
सबसे प्रचलित मान्यता यह है कि ठाकुर जी की दृष्टि इतनी प्रभावशाली है कि लगातार देखने पर भक्त भाव में खो सकता है। एक कथा में कहा जाता है कि एक भक्त ठाकुर जी को निहारता रहा और वे उसके साथ चल दिए, पीछे मंदिर में मूर्ति नहीं मिली। तब से कुछ कुछ देर में पर्दा डालने की रीति शुरू हुई। दूसरी तरफ सेवा की दृष्टि से कहा जाता है कि ठाकुर जी को बालक की तरह संभाला जाता है, इसलिए बीच बीच में विश्राम का भाव रखा गया है।
मंदिर की कुछ अनोखी परंपराएं
यहां मंगला आरती सिर्फ जन्माष्टमी के दिन होती है, रोज नहीं। इसके पीछे मान्यता है कि ठाकुर जी रात को निधिवन में रास करके देर से सोते हैं, इसलिए उन्हें सुबह जगाया नहीं जाता।
चरण दर्शन साल में एक बार अक्षय तृतीया पर होते हैं।
घंटा और शंख की ध्वनि यहां आम मंदिरों की तरह नहीं की जाती, ताकि बाल रूप ठाकुर जी विश्राम में रहें।
भोग में माखन, मिश्री और खीर जैसी चीजें प्रमुख हैं।
यात्रा से पहले कुछ व्यावहारिक बातें
छुट्टियों और उत्सवों में गलियां बहुत संकरी और भीड़ भरी हो जाती हैं। बुजुर्गों और छोटे बच्चों को साथ ले जा रहे हों तो सुबह जल्दी या कम भीड़ वाले दिन चुनें। मोबाइल और बैग जमा करने के नियम समय के साथ बदले हैं।
ध्यान दें: दर्शन का समय, प्रवेश के नियम और किसी भी तरह की व्यवस्था बदलती रहती है। प्रकाशित करने से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट या स्थानीय प्रशासन की सूचना से जांच लें। इस लेख में जानबूझकर समय नहीं लिखा गया है।
वृंदावन में आसपास क्या देखें
निधिवन, प्रेम मंदिर, इस्कॉन मंदिर और यमुना किनारे की केशी घाट आरती आम तौर पर लोग एक ही यात्रा में कर लेते हैं। राधा रानी के भक्त बरसाना भी जाते हैं। इस विषय पर हमारा राधा रानी वाला लेख भी देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बांके बिहारी मंदिर कहां है?
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में वृंदावन शहर में।
बांके बिहारी जी की पूजा किसके रूप में होती है?
मान्यता के अनुसार राधा और कृष्ण दोनों के संयुक्त रूप में, पर प्रचलित स्वरूप बालकृष्ण जैसा है।
मंदिर में मंगला आरती क्यों नहीं होती?
परंपरा है कि ठाकुर जी रात्रि में रास करते हैं और देर से विश्राम करते हैं। केवल जन्माष्टमी पर मंगला आरती होती है।
बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए बुकिंग लगती है?
नियम बदलते रहते हैं। आधिकारिक साइट पर ताजा जानकारी देखें।
मंत्र
पूजा विधि
आरती और भजन
