
देवता
सावित्री-सत्यवान एवं यमराज; वट (बरगद) वृक्ष
तिथि / समय
ज्येष्ठ मास, उत्तर भारत में कृष्ण अमावस्या, महाराष्ट्र में शुक्ल पूर्णिमा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार राजकुमारी सावित्री ने निर्वासित-अंध राजा के पुत्र सत्यवान से विवाह किया, जिसकी मृत्यु एक वर्ष में होनी निश्चित थी। सावित्री को नारद जी ने सत्यवान की आयु का समाचार दिया था, तब भी उन्होंने अपने निश्चय से विवाह किया। विवाह के बाद सावित्री ने वनवास में ससुराल के साथ रहना स्वीकार किया, तपस्वी जीवन अपनाया तथा गिनती के दिन बीतते रहे।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
प्रातः स्नान के बाद वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करें, वृक्ष की जल-सिंचाई, जड़ में जल-अक्षत, कलावा बाँधना तथा परिक्रमा करना। वट की डाली पर सूत/कलावा बाँधकर सावित्री-सत्यवान कथा का श्रवण करें। उपवास रखें तथा ब्राह्मण-सुहागिनों को भोजन एवं सुहाग-सामग्री दान करें। प्रसाद बाँटकर पारण करें। सात प्रकार के अन्न/फल (क्षेत्रीय परंपरा) का दान विशेष है।
पूजा सामग्री
- वट-वृक्ष (बरगद)
- कलावा (लाल सूत)
- सुहाग-सामग्री
- फल-अक्षत
- कथा-पोथी
- दान-सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सुहाग की दीर्घता, पति की आयु-रक्षा, संतान-सुख एवं सौभाग्य।
व्रत कथा
महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार राजकुमारी सावित्री ने निर्वासित-अंध राजा के पुत्र सत्यवान से विवाह किया, जिसकी मृत्यु एक वर्ष में होनी निश्चित थी। सावित्री को नारद जी ने सत्यवान की आयु का समाचार दिया था, तब भी उन्होंने अपने निश्चय से विवाह किया। विवाह के बाद सावित्री ने वनवास में ससुराल के साथ रहना स्वीकार किया, तपस्वी जीवन अपनाया तथा गिनती के दिन बीतते रहे।
नियत दिन जब सत्यवान लकड़ी काटने वन गया, सावित्री भी साथ गई। सत्यवान को सिर में पीड़ा उठी तथा वह सावित्री की गोद में गिरकर प्राण त्याग गया। उसी क्षण यमराज स्वयं अपने भैंसे पर आए तथा सत्यवान के प्राण-पाश खींचने लगे। सावित्री उठकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने अनेक बार लौटने को कहा, परंतु सावित्री ने विनम्रता एवं धर्म-संबंधी संवाद करते रहे।
सावित्री के वाक्-सौंदर्य तथा पतिव्रत-धर्म से प्रसन्न यमराज ने वर माँगने को कहा। सावित्री ने क्रम से अपने ससुर की दृष्टि, राज्य, पिता के लिए संतान तथा अपने लिए सौ पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने सब दिया। अंत में जब सावित्री ने कहा कि सौ पुत्र तो न हों यदि पति न रहा, तब यमराज बंधे हुए श्राप-से मुक्त हो गए तथा उन्हें सत्यवान को पुनः प्राण देने पड़े। सत्यवान जी उठ खड़ा हुआ और सावित्री के पतिव्रत की सार्वभौमिक प्रसिद्धि हो गई।
वट वृक्ष सावित्री के व्रत से इसलिए जुड़ा क्योंकि परंपरा के अनुसार सावित्री का पुनः-प्राप्ति-प्रसंग वट वृक्ष के नीचे संबंधित माना गया है, वट की दीर्घ आयु तथा अनेक जड़ों वाला विस्तार सुहाग की दीर्घता एवं संतान-विस्तार का प्रतीक बना। यही कारण है कि सुहागिन स्त्रियाँ वट की डाल पर लाल कलावा बाँधकर परिक्रमा करती हैं तथा वृक्ष की आयु-सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं। व्रत का विश्वास है कि सावित्री के समान निष्ठा से व्रत करने वाली स्त्री के सुहाग की रक्षा यमराज भी नहीं तोड़ सकते। पूरी विस्तृत कथा भाग 4 में दी गई है।
सामान्य प्रश्न
सुहाग की दीर्घता, पति की आयु-रक्षा, संतान-सुख एवं सौभाग्य।
