Aur Vrat Vrat

वसंत पंचमी (श्री पंचमी) व्रत

परंपरा में इसी दिन से वसंत ऋतु आरंभ मानी गई है। कथा है कि कामदेव ने शिव के ध्यान भंग करने के प्रयास के दौरान इसी ऋतु में अपनी पंच-बाण-शक्ति का प्रयोग किया था। क…

वसंत पंचमी (श्री पंचमी) व्रत व्रत

देवता

माँ सरस्वती एवं कामदेव (वसंत-परंपरा)

तिथि / समय

माघ शुक्ल पंचमी

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा में इसी दिन से वसंत ऋतु आरंभ मानी गई है। कथा है कि कामदेव ने शिव के ध्यान भंग करने के प्रयास के दौरान इसी ऋतु में अपनी पंच-बाण-शक्ति का प्रयोग किया था। कथा इस प्रकार है, तारकासुर नामक दैत्य का वध केवल शिव-पुत्र के हाथों संभव था। परंतु शिव हिमालय में घोर तप में मग्न थे। तब इंद्र ने कामदेव को शिव का ध्यान भंग करने के लिए भेजा। वसंत ऋतु के समय कामदेव ने अपने पुष्प-बाण तैयार किए, रति सहित शिव के समीप गए तथा उस समय चुना गया जब पार्वती जी पूजा-सामग्री लेकर उपस्थित थीं।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    प्रातः स्नान करें (कुमकुम-मिश्रित जल से स्नान की परंपरा)। सरस्वती पूजा करें, पीले वस्त्र, पीले फूल तथा पीले भोग (खीर, बेसन के लड्डू) का विधान रखें। कलम, किताब, वीणा एवं कला-सामग्री की पूजा करें; बच्चों का विद्यारंभ (अक्षर-अभ्यास प्रारंभ) इसी दिन कराने की परंपरा है। श्रीमद्भागवत पाठ आरंभ करने का मुहूर्त भी यही माना गया है। उपवास वैकल्पिक है। देवी को पीली चुनरी अर्पित करें।

पूजा सामग्री

  • सरस्वती चित्र/प्रतिमा
  • पीले वस्त्र-फूल-मिठाई (बेसन-लड्डू
  • खीर)
  • वीणा-सामग्री (श्रृंगार)
  • कलम-किताब (पूजा हेतु)
  • अक्षत-चंदन

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

विद्या-प्राप्ति, बुद्धि-वृद्धि, वाणी-सिद्धि एवं कला-संगीत में कौशल।

व्रत कथा

परंपरा में इसी दिन से वसंत ऋतु आरंभ मानी गई है। कथा है कि कामदेव ने शिव के ध्यान भंग करने के प्रयास के दौरान इसी ऋतु में अपनी पंच-बाण-शक्ति का प्रयोग किया था। कथा इस प्रकार है, तारकासुर नामक दैत्य का वध केवल शिव-पुत्र के हाथों संभव था। परंतु शिव हिमालय में घोर तप में मग्न थे। तब इंद्र ने कामदेव को शिव का ध्यान भंग करने के लिए भेजा। वसंत ऋतु के समय कामदेव ने अपने पुष्प-बाण तैयार किए, रति सहित शिव के समीप गए तथा उस समय चुना गया जब पार्वती जी पूजा-सामग्री लेकर उपस्थित थीं।

कामदेव ने अपना कोमल-बाण चलाया। शिव का ध्यान भंग हुआ। क्रोध से उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोली और कामदेव भस्म हो गए। रति ने विलाप किया। कालांतर में शिव प्रसन्न हुए तथा उन्होंने कामदेव को अंतःकरण में शरीर-रहित (अनंग) रूप से रहने का वरदान दिया। परंपरा में इसी प्रसंग की स्मृति से माघ शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ एवं काम-पूजा (क्षेत्रीय) जुड़ी रही है।

सरस्वती पूजा की मुख्य कथा-परंपरा इस प्रकार है, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के बाद अपनी इंद्रियों से जो शब्द-वाणी सुनी, उसे व्यवस्थित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता अनुभव की। उनकी तपस्या से श्वेत वस्त्र-विभूषित, वीणा-हस्त सरस्वती प्रकट हुईं। उनकी वाणी से समस्त विद्या, संगीत तथा कला-विज्ञान की धारा प्रवाहित हुई। ब्रह्मा ने उनसे सृष्टि को नाम-विद्या देने की प्रार्थना की, तब से सरस्वती विद्या की देवी मानी गईं। इसी देवी की आराधना वसंत पंचमी को की जाती है।

इस दिन की पूजा से विद्या, बुद्धि, कला एवं संगीत की प्राप्ति होती है। कलम-किताब की पूजा से विद्यार्थी की स्मरण-शक्ति बढ़ती है। पीला रंग वसंत की कोमलता एवं ज्ञान की कांति का प्रतीक मानकर पूरे भारत में पीले वस्त्र-भोग का विधान बन गया। जो साधक इस दिन विधिपूर्वक सरस्वती-उपासना करते हैं, उन्हें वाणी-सिद्धि एवं कला-सिद्धि प्राप्त होती है।

सामान्य प्रश्न

विद्या-प्राप्ति, बुद्धि-वृद्धि, वाणी-सिद्धि एवं कला-संगीत में कौशल।

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