Aur Vrat Vrat

वरलक्ष्मी व्रतम्

परंपरा की कथा में एक स्त्री ने वेंकटेश्वर की पूजा में लक्ष्मी की उपेक्षा की थी; क्रोधित लक्ष्मी ने परीक्षा ली तथा व्रत-स्वीकार से प्रसन्न होकर वर दिया था। कथा इ…

वरलक्ष्मी व्रतम् व्रत

देवता

माँ महालक्ष्मी (वरलक्ष्मी, वर देने वाली लक्ष्मी)

तिथि / समय

श्रावण मास की शुक्ल पक्ष का शुक्रवार (आदि/प्रथम शुक्रवार; क्षेत्रीय भेद से परंपरा भिन्न)

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा की कथा में एक स्त्री ने वेंकटेश्वर की पूजा में लक्ष्मी की उपेक्षा की थी; क्रोधित लक्ष्मी ने परीक्षा ली तथा व्रत-स्वीकार से प्रसन्न होकर वर दिया था। कथा इस प्रकार है, एक सुशील स्त्री नियम से प्रति शुक्रवार वेंकटेश्वर स्वामी की पूजा करती थी, परंतु वह लक्ष्मी की पूजा में उदासीन थी। एक दिन वृद्धा रूप में लक्ष्मी ने उसके घर आकर कहा, 'तू स्वामी की पूजा करती है, यह भला है, परंतु स्वामी के वक्षस्थल में मेरा ही वास है; मुझ पर ध्यान दे।' स्त्री ने वृद्धा की बात उपेक्षित की।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    कलश पर चावल के आटे/नारियल-तिल की रचना से लक्ष्मी का मुख बनाएँ (क्षेत्रीय पद्धति), कलश को वस्त्र-चुनरी से सजाएँ तथा कलश- पूजा करें। क्षेत्रीय परंपरा में सोलह कलशों की स्थापना भी होती है। लक्ष्मी-स्वरूप कलश की षोडशोपचार पूजा करें, हार-पुष्प अर्पित करें तथा वरलक्ष्मी व्रत कथा का श्रवण करें। सुहागिन स्त्रियाँ स्वयं को सूर्य-निर्माण से सजाती हैं। उपवास अथवा फलाहार रखें। विसर्जन के उपरांत प्रसाद बाँटें। अगले वर्ष पुनः संकल्प लेने की परंपरा है।

पूजा सामग्री

  • कलश (तांबा/मिट्टी का)
  • चावल-हल्दी से लक्ष्मी-मुख निर्माण
  • सोलह कलश (क्षेत्रीय)
  • फूल-हार
  • दीप
  • प्रसाद सामग्री
  • वस्त्र-चुनरी
  • फल

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

सौभाग्य-अक्षयता, संतान-सुख, धन-समृद्धि एवं वर-प्राप्ति।

व्रत कथा

परंपरा की कथा में एक स्त्री ने वेंकटेश्वर की पूजा में लक्ष्मी की उपेक्षा की थी; क्रोधित लक्ष्मी ने परीक्षा ली तथा व्रत-स्वीकार से प्रसन्न होकर वर दिया था। कथा इस प्रकार है, एक सुशील स्त्री नियम से प्रति शुक्रवार वेंकटेश्वर स्वामी की पूजा करती थी, परंतु वह लक्ष्मी की पूजा में उदासीन थी। एक दिन वृद्धा रूप में लक्ष्मी ने उसके घर आकर कहा, 'तू स्वामी की पूजा करती है, यह भला है, परंतु स्वामी के वक्षस्थल में मेरा ही वास है; मुझ पर ध्यान दे।' स्त्री ने वृद्धा की बात उपेक्षित की।

कुछ समय में उसके घर का वैभव क्षीण होने लगा। स्त्री को स्वप्न में दिशा मिली कि उसे वरलक्ष्मी व्रत का विधान अपनाना चाहिए। उसने श्रावण के शुक्रवार को विधिपूर्वक कलश-स्थापना करके लक्ष्मी की उपासना की तथा कथा-श्रवण किया। वरलक्ष्मी प्रसन्न हुईं तथा उन्होंने कहा, 'जो स्त्री श्रावण-शुक्रवार को विधिपूर्वक मेरा कलश-स्वरूप पूजती है, मैं उसे सौभाग्य, संतान तथा समृद्धि का वर देती हूँ।' स्त्री का घर पुनः समृद्धि से भर गया।

कथा का सार यह है कि कलख का प्रतीक लक्ष्मी का स्वरूप है, कलश में जल, आम्र-पत्र, नारियल तथा मुख-रचना ये सब मिलकर समगृहस्थ-समृद्धि का प्रतीक बनते हैं। वरलक्ष्मी व्रत का महत्त्व सौभाग्य की अक्षयता तथा संतान-कल्याण है। कथा-परंपरा में यह विशेष नियम है कि व्रत करने से पूर्व सुहागिन स्त्री को व्रत का संकल्प दूसरी योग्य सुहागिन से लेना चाहिए, जिससे व्रत की शुद्धता बनी रहे।

व्रत का फल विशेषकर सौभाग्य-रक्षा, संतान-प्राप्ति एवं धन-समृद्धि का वर माना गया है। जो स्त्रियाँ विधिपूर्वक वरलक्ष्मी व्रत करती हैं, उनके परिवार में ऐश्वर्य एवं कल्याण का संतुलन बना रहता है। यह व्रत सम्मान के साथ दक्षिण भारत से हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी फैला, पोथी-परंपरा में इसकी कथा अनेक परिवारों की श्रद्धा से जुड़ी है।

सामान्य प्रश्न

सौभाग्य-अक्षयता, संतान-सुख, धन-समृद्धि एवं वर-प्राप्ति।

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