
देवता
भगवान शिव एवं माँ पार्वती
तिथि / समय
लगातार सोलह सोमवार (या चार/बाईस सोमवार के नियम से)
श्रेणी
Somvar व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा के अनुसार पार्वती जी की सेविका ने इस व्रत से उत्तम वर प्राप्त किया, तत्पश्चात व्यापारिणी स्त्री के घर पर रही बालिका ने भी यह व्रत करके सुयोग्य वर पाया। यह कथा लोक-पोथियों में इस प्रकार प्रचलित है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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सोलह क्रमिक सोमवारों में शिव-पार्वती की पूजा करें, प्रत्येक सोमवार उपवास अथवा एक समय भोजन रखें तथा शिव कथा का वाचन करें। श्वेत अथवा शुद्ध वस्त्र पहनें। सोलहवें सोमवार को विधिपूर्वक उद्यापन करें, शिव-पार्वती की पूजा, खीर का भोग, ब्राह्मण-भोजन तथा दक्षिणा-दान कर व्रत की समाप्ति करें। कुमारिका कन्याओं को भोजन कराने का विशेष विधान रहा है।
पूजा सामग्री
- कच्चा दूध
- बेलपत्र
- चंदन
- शक्कर
- खीर (भोग)
- शिव-चित्र
- श्वेत वस्त्र
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
उत्तम वर-प्राप्ति, सुहाग की रक्षा एवं गृह-सुख की स्थिरता।
व्रत कथा
परंपरा के अनुसार पार्वती जी की सेविका ने इस व्रत से उत्तम वर प्राप्त किया, तत्पश्चात व्यापारिणी स्त्री के घर पर रही बालिका ने भी यह व्रत करके सुयोग्य वर पाया। यह कथा लोक-पोथियों में इस प्रकार प्रचलित है।
कथा है कि कैलाश पर माता पार्वती की एक सेविका थी, जो स्वयं के सौभाग्य की इच्छा से बड़ी दुखी रहती थी। एक बार उसने माता से प्रार्थना की, 'माँ, मुझ अपवित्र-जन्मा को भी सुयोग्य पति मिल सकता है क्या?' पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा, 'शिव-कृपा से सब संभव है। तू पृथ्वी पर जाकर सोलह सोमवार व्रत का नियम से पालन कर; व्रत के उद्यापन पर सुयोग्य वर अवश्य मिलेगा।' सेविका पृथ्वी पर अवतरित हुई और उसने विधिपूर्वक सोलह सोमवार व्रत किए। उद्यापन के दिन उसे स्वयं शिव-प्रेरणा से एक उत्तम वर मिल गया तथा उसका जीवन सुखी हो गया।
दूसरा प्रसंग व्यापारिणी की बालिका का है। एक नगर में व्यापारिणी नाम की स्त्री अपनी एक छोटी बालिका के साथ रहती थी। बालिका विवाह-योग्य हो चुकी थी, पर उसका विवाह कहीं जुड़ नहीं रहा था। सेविका के व्रत की कथा सुनकर उसने उसी बालिका के साथ यह व्रत आरंभ किया। दोनों ने प्रति सोमवार विधिपूर्वक व्रत रखा, शिव-पूजा की तथा कथा-श्रवण किया। तेरहवें सोमवार पर ही एक सुशील एवं संपन्न वर का प्रस्ताव आ गया तथा सोलह सोमवार पूर्ण होने पर अत्यंत वैभव के साथ विवाह संपन्न हुआ। व्यापारिणी ने बालिका के साथ सोलह ब्राह्मणों का भोजन एवं दक्षिणा-वस्त्र का दान करके व्रत का उद्यापन किया।
यह व्रत मुख्यतः कुमारिकाओं द्वारा उत्तम वर की कामना से तथा सुहागिन स्त्रियों द्वारा सुहाग की रक्षा के लिए किया जाता है। परंपरा के अनुसार व्रत के उद्यापन तक संयम का पालन आवश्यक है; व्रत में विश्वास एवं श्रद्धा ही फल का मूल कारण मानी गई है। जिन स्त्रियों या पुरुषों ने विधि-निष्ठा से सोलह सोमवार पूर्ण किए हैं, उनके गृह-जीवन में सुख, संतान एवं समृद्धि बनी रहने का विश्वास प्रचलित है।
सामान्य प्रश्न
उत्तम वर-प्राप्ति, सुहाग की रक्षा एवं गृह-सुख की स्थिरता।
