
देवता
संतोषी माता (गणेश-पुत्री परंपरा; संतोष-दायिनी माता)
तिथि / समय
प्रत्येक शुक्रवार, परंपरा में सोलह अथवा पाँच शुक्रवार का नियम
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
प्रसिद्ध कथा में एक गाँव की बुढ़िया के सात पुत्र थे, छह कमाने वाले और एक भक्त; भक्त पुत्र की पत्नी को संतोषी माता की कृपा से सुख मिला था। पूरी विस्तृत कथा इस संग्रह के भाग 4 में दी गई है; यहाँ व्रत-प्रविष्टि के रूप में उसका मर्म यह है कि संतोष का देवत्त्व सर्वदुखों का निवारक है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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शुक्रवार को एक समय भोजन करें (वह भी सायंकाल)। गुड़ एवं भुने चने का भोग लगाएँ, संतोषी माता कथा का वाचन करें तथा प्रसाद वितरण करें। व्रत के दिन खट्टी वस्तुएँ (नींबू, अमचूर, दही आदि) न खाएँ तथा न ही किसी को खिलाएँ-यह व्रत का विशिष्ट नियम है। सोलह शुक्रवार पूर्ण होने पर विधिपूर्वक उद्यापन करें, कथा-वाचन, भोजन एवं बाल-कन्या भोजन का आयोजन करें। एक समय में केवल एक व्यक्ति (व्रती) का व्रत रखने की परंपरा है।
पूजा सामग्री
- गुड़
- भुना चना
- कुमकुम
- फूल
- दीप-धूप
- कथा-पोथी
- हरा वस्त्र/चुनरी (परंपरा)
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
घर में सुख-समृद्धि, भोजन-वस्त्र की अक्स्मता, संतोष-प्राप्ति एवं संकट-नाश।
व्रत कथा
प्रसिद्ध कथा में एक गाँव की बुढ़िया के सात पुत्र थे, छह कमाने वाले और एक भक्त; भक्त पुत्र की पत्नी को संतोषी माता की कृपा से सुख मिला था। पूरी विस्तृत कथा इस संग्रह के भाग 4 में दी गई है; यहाँ व्रत-प्रविष्टि के रूप में उसका मर्म यह है कि संतोष का देवत्त्व सर्वदुखों का निवारक है।
कथा का सार, एक गाँव में एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। उसके सात पुत्र थे, जिनमें छह व्यापार-कर्म में संलग्न थे तथा सातवाँ साधु-स्वभाव वाला भक्त था, जो केवल सत्य-सेवा एवं भजन में रहता। छहों भाई सातवाँ की पत्नी को उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे। सातवें पुत्र की पत्नी ने गुरु-मार्गदर्शन से संतोषी माता का शुक्रवार व्रत अपनाया, गुड़-चने का भोग, कथा-श्रवण तथा सोलह शुक्रवारों का नियम।
व्रत के प्रभाव से उसके घर में धन-धान्य आने लगा तथा उसके पति की वाणी एवं स्थिति में प्रतिष्ठा बनी। परंतु उसकी ननदों (पति की भाभियों) को यह सुख देखा नहीं गया। उन्होंने एक दिन छल से उसे खट्टा भोजन खिला दिया, जिससे व्रत भंग हुआ। तुरंत ही संकट आया, घर का सुख डगमगा गया तथा संतोषी माता का पक्ष समाप्त हो गया।
व्रती स्त्री ने माता की कथा पुनः पढ़कर अपने अपराध को समझा तथा उसने पुनः सोलह शुक्रवारों का व्रत-नियम अपनाकर शुद्धि अर्जित की। माता प्रसन्न हुईं, उसके पति को सुख-वैभव मिला तथा ननदों को भी व्रत की महत्ता का ज्ञान हुआ। उद्यापन के समय संतोषी माता ने स्वयं एक बालिका के रूप में प्रकट होकर प्रसाद लिया, यह प्रसंग कथा की श्रद्धा का प्रमाण है।
व्रत का नियम विशिष्ट है, खट्टी वस्तु का त्याग। इसका प्रतीकात्मक भाव यह है कि जीवन में 'खटास' (असंतोष-वाणी एवं तीक्ष्ण व्यवहार) का त्याग करके संतोष का सेवन करना ही माता की वास्तविक पूजा है। गुड़-चना मिठास एवं पौष्टिकता का प्रतीक है। सोलह शुक्रवार के नियम से जीवन का असंतोष दूर होकर सुख की स्थिरता आती है, यही इस व्रत का अंतिम संदेश है।
सामान्य प्रश्न
घर में सुख-समृद्धि, भोजन-वस्त्र की अक्स्मता, संतोष-प्राप्ति एवं संकट-नाश।
