Aur Vrat Vrat

संतोषी माता की पूरी कथा

संतोषी माता की कथा लोक-पोथी-परंपरा का अनमोल रत्न है। कथा है कि एक गाँव में एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। उसके सात पुत्र थे, छह पुत्र व्यापार-कर्म में संलग्न थे तथा स…

संतोषी माता की पूरी कथा व्रत

देवता

तिथि / समय

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

संतोषी माता की कथा लोक-पोथी-परंपरा का अनमोल रत्न है। कथा है कि एक गाँव में एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। उसके सात पुत्र थे, छह पुत्र व्यापार-कर्म में संलग्न थे तथा सातवाँ पुत्र साधु-स्वभाव का भक्त था, जो किसी से कुछ नहीं लेता, केवल भजन-कीर्तन एवं सत्य-आचरण में रहता था। छह भाई अपनी पत्नियों सहित व्यापार में लगे रहते, परंतु बहू भक्त-पुत्र की पत्नी को घर के कार्यों में लगातार रखते, उसे अन्न-पानी में भी उपेक्षित रखते।

व्रत विधि

कैसे रखें

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पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    संतोषी माता की कथा लोक-पोथी-परंपरा का अनमोल रत्न है। कथा है कि एक गाँव में एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। उसके सात पुत्र थे, छह पुत्र व्यापार-कर्म में संलग्न थे तथा सातवाँ पुत्र साधु-स्वभाव का भक्त था, जो किसी से कुछ नहीं लेता, केवल भजन-कीर्तन एवं सत्य-आचरण में रहता था। छह भाई अपनी पत्नियों सहित व्यापार में लगे रहते, परंतु बहू भक्त-पुत्र की पत्नी को घर के कार्यों में लगातार रखते, उसे अन्न-पानी में भी उपेक्षित रखते।

    एक दिन साधु-संतों का दल गाँव आया। भक्त-पुत्र की पत्नी ने उनके चरण धोए तथा सेवा की। उसकी सेवा से एक साधु प्रसन्न हुए। साधु ने उसे संतोषी माता के शुक्रवार-व्रत का विधान बताया, 'प्रति शुक्रवार एक समय (सायं) सात्विक भोजन कर, गुड़ एवं भुने चने का भोग लगा, माता की कथा पढ़ और सोलह शुक्रवार पूर्ण कर। इस दौरान खट्टी वस्तु का सेवन भूल से भी न कर, किसी को भी न खिला।'

    व्रत के प्रभाव से उसके घर अन्न-धन की व्यवस्था बनने लगी। उसके भक्त-पति के स्वभाव-प्रभाव से गाँव में उसकी मान-प्रतिष्ठा भी बनी। किंतु उसकी ननदों (पति की भाभियों) को उसका सुख देखा नहीं गया। एक शुक्रवार उन्होंने छल से उसे खट्टी रोटी खिला दी। उसी क्षण व्रत भंग हुआ, उसके घर का सुख बिखर गया तथा भक्त-पति के साथ अकारण कलह का वातावरण बन गया।

    व्रती स्त्री को क्षमा-ज्ञान हुआ। उसने पुनः संकल्प लेकर सोलह शुक्रवारों का नियम-निष्ठा से पालन किया, माता की कथा दोहराई तथा उद्यापन का आयोजन किया। उद्यापन के प्रसाद-भोज में संतोषी माता स्वयं एक बालिका के रूप में प्रकट होकर प्रसाद ग्रहण करने आईं। ननदों ने छल से उस बालिका को भी खट्टा खिलाया, परंतु माता को सब ज्ञात था, उन्होंने ननदों को उनके छल का ज्ञान कराया तथा व्रती के पुनः प्रतिष्ठित किया। घर में पुनः सुख-सौहार्द लौट आया तथा ननदों ने भी संतोषी माता का व्रत अपनाया।

    कथा का संदेश स्पष्ट है, संतोष ही सर्वसुखों का मूल है। गुड़-चना मिठास का प्रतीक है तथा खट्टी वस्तु का त्याग जीवन की 'खटास' (तीक्ष्ण वाणी एवं असंतोष) के त्याग का प्रतीक है। जो गृहस्थ प्रति शुक्रवार व्रत-कथा के साथ संतोष-भाव अपनाता है, उसके घर माता की कृपा से सुख-समृद्धि स्थिर रहती है, यही इस कथा का अंतिम निष्कर्ष है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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