
देवता
श्री गणेश जी
तिथि / समय
प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी, चंद्रोदय के बाद पूजा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
कथा-परंपरा में चंद्र देव को गणेश जी के शाप से मुक्ति का प्रसंग प्रमुख है; गणेश जी ने क्रोध में चंद्र को शाप दिया था, जिसका निवारण इसी व्रत से संबंधित माना गया है। कथा इस प्रकार है, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की शुभ रात्रि में गणेश जी चंद्रमा के समक्ष मयूर पर विराजमान थे। चंद्रमा को अपनी कांति पर अभिमान था; उसने गणेश जी के भारी शरीर तथा मयूर की दशा पर व्यंग्य किया और हँसने लगा।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
दिन भर उपवास अथवा फलाहार रखें। प्रातः गणेश पूजा करें। सायं चंद्रोदय के बाद चंद्र-दर्शन कर अर्घ्य दें तथा संकष्टी चतुर्थी कथा का श्रवण करें। मोदक-लड्डू एवं दूर्वा का भोग लगाएँ। चंद्रोदय तक निराहार रहने का नियम है। चतुर्थी के दिन चंद्र-दर्शन एवं चंद्र-अर्घ्य का विधान विशेष महत्त्व रखता है। कथा-वाचन के बाद प्रसाद-वितरण कर व्रत का पारण करें।
पूजा सामग्री
- दूर्वा
- मोदक-लड्डू
- लाल पुष्प
- गणेश प्रतिमा/चित्र
- चंदन
- धूप-दीप
- अर्घ्य-जल
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संकट-मोचन, अपकार-आरोप से मुक्ति, संतान-रक्षा एवं विद्या-वृद्धि।
व्रत कथा
कथा-परंपरा में चंद्र देव को गणेश जी के शाप से मुक्ति का प्रसंग प्रमुख है; गणेश जी ने क्रोध में चंद्र को शाप दिया था, जिसका निवारण इसी व्रत से संबंधित माना गया है। कथा इस प्रकार है, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की शुभ रात्रि में गणेश जी चंद्रमा के समक्ष मयूर पर विराजमान थे। चंद्रमा को अपनी कांति पर अभिमान था; उसने गणेश जी के भारी शरीर तथा मयूर की दशा पर व्यंग्य किया और हँसने लगा।
गणेश जी ने क्रोधित होकर शाप दिया, 'जो तिथि पर तूने मेरा अपमान किया है, उस चतुर्थी को जो भी तुझे देखेगा, उस पर अपकार का आरोप लगेगा।' चंद्रमा की कांति क्षीण हो गई तथा उसका अपमान सब ओर होने लगा। भयभीत चंद्र ने ब्रह्मा जी की शरण ली। ब्रह्मा जी ने समाधान बताया, चतुर्थी की रात्रि को चंद्र-दर्शन से पूर्व गणेश-पूजा एवं अर्घ्य-दान करके शाप का प्रभाव कम किया जा सकता है। चंद्रमा ने वैसा ही किया तथा देवताओं ने भी संकष्टी चतुर्थी के चंद्रोदय काल में गणपति की पूजा आरंभ की। गणेश जी प्रसन्न हुए तथा चंद्र की कांति को वापिस दी तथा कहा, 'चतुर्थी के चंद्र-दर्शन वाले अपकार से डरेंगे, परंतु जो विधिपूर्वक मेरी पूजा कर चंद्र को अर्घ्य देगा, वह संकट से विमुक्त होगा।'
दूसरा प्रसंग ऋषि-परंपरा से जुड़ा है, एक बार गणेश जी की पूजा एवं अर्घ्य अपार्जित रह जाने से ऋषि पुत्र मयूर गणेश जी का अंश धारण करके संकट में फँसे व्यक्तियों की रक्षा करते थे। संकष्टी चतुर्थी की व्रत-परंपरा में दूर्वा एवं चंद्रोदय-अर्घ्य का विशेष महत्त्व इसीलिए है।
व्रत का फल परंपरा में इस प्रकार वर्णित है, जो व्यक्ति प्रत्येक मास की संकष्टी चतुर्थी का विधिपूर्वक निर्वाह करता है, उसके समस्त संकट, अपकार के आरोप, रोग एवं बाधाएँ नष्ट होती हैं। संतान सुख एवं विद्या की वृद्धि होती है। यह व्रत संकट-मोचन का शीघ्रतम उपाय माना गया है। चंद्रोदय से पूर्व गणपति-कथा वाचन तथा व्रती गण द्वारा प्रसाद-वितरण का आयोजन घर-घर में होता है।
सामान्य प्रश्न
संकट-मोचन, अपकार-आरोप से मुक्ति, संतान-रक्षा एवं विद्या-वृद्धि।
