
देवता
माँ लक्ष्मी, संतोषी माता एवं शुक्र ग्रह
तिथि / समय
प्रत्येक शुक्रवार; संतोषी व्रत के नियम से सोलह अथवा पाँच शुक्रवार
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
शुक्रवार की देवी-उपासना से धन-लक्ष्मी एवं घर-सुख की प्राप्ति परंपरा में वर्णित है। संतोषी माता व्रत की कथा लोक-परंपरा का अनमोल रत्न मानी जाती है, जो इस संग्रह में संख्या 36 की प्रविष्टि में विस्तार से दी गई है। यहाँ लक्ष्मी-उपासना की शुक्रवार-कथा का उल्लेख प्रासंगिक है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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संतोषी माता व्रत में शुक्रवार के दिन एक समय (सायंकाल) भोजन करें, गुड़ एवं भुने चने का भोग लगाएँ, माता की कथा का वाचन-श्रवण करें तथा प्रसाद बाँटें। व्रत के दिन खट्टी वस्तुएँ न खाएँ तथा न खिलाएँ, यह विशेष नियम है। लक्ष्मी-पूजा के लिए सायं दीप प्रज्वलित करें, कुमकुम-अक्षत अर्पित करें तथा महालक्ष्मी अष्टोत्तर का पाठ करें। शुक्र ग्रह की पीड़ा शांत करने हेतु श्वेत वस्तु, चावल अथवा दही-मिठाई का दान करें।
पूजा सामग्री
- गुड़
- भुना चना
- कुमकुम
- फूल
- दीप
- मेहंदी
- श्वेत वस्त्र
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
धन-लक्ष्मी की प्राप्ति, गृह-सुख, शुक्र-दोष शांति एवं ऐश्वर्य।
व्रत कथा
शुक्रवार की देवी-उपासना से धन-लक्ष्मी एवं घर-सुख की प्राप्ति परंपरा में वर्णित है। संतोषी माता व्रत की कथा लोक-परंपरा का अनमोल रत्न मानी जाती है, जो इस संग्रह में संख्या 36 की प्रविष्टि में विस्तार से दी गई है। यहाँ लक्ष्मी-उपासना की शुक्रवार-कथा का उल्लेख प्रासंगिक है।
कथा है कि एक नगर में एक गरीब गृहिणी रहती थी, जिसका घर संतान-सुख एवं धन दोनों से रहित था। पर वह प्रति शुक्रवार स्नान-ध्यान करके माता लक्ष्मी के समक्ष एक दीप जलाती तथा जो कुछ घर में होता, उसी से देवी को भोग लगाती। एक शुक्रवार देर रात उसके द्वार पर एक वृद्धा ने धूल-धूसरित अवस्था में दस्तक दी और कहा, 'मैं अजनबी हूँ, मेरा बाल दिन भर का भोजन भी नहीं हुआ, चार दिन की भूखी हूँ।' घर में स्वयं गृहिणी के लिए मुट्ठी भर भी अन्न नहीं था। उसने अपने अंश का दुबारा आधा भाग बाँटकर वृद्धा को अपने आँगन में बैठाकर भोजन कराया और उसे छत की छाया देकर सुला दिया।
स्वप्न में उस रात्रि वृद्धा के रूप में स्वयं महालक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्होंने कहा, 'मैं तेरी श्रद्धा देखने आई थी। तूने अपने ही अंश का अंश बाँटा, यही मेरी पूजा का विधिपूर्ण अंग है। जो देता है, उसे देने वाली की ओर से दोनों हाथों से मिलता है। तेरा घर आज से सुख से भर जाएगा।' प्रातः उठकर गृहिणी ने देखा कि उसके आँगन में एक तांबे का कलश भरा हुआ रखा है तथा घर में सुख-वैभव की कमी समाप्त हो गई है। उसने आजीवन प्रत्येक शुक्रवार लक्ष्मी-दीप जलाया तथा अन्न का दान करना नहीं छोड़ा।
कथा का संदेश है कि शुक्रवार की देवी-उपासना में दान-भाव तथा अतिथि-सेवा का विशेष महत्त्व है। जो गृहस्थ इस दिन दीप जलाकर अन्न-जल बाँटते हैं, उनके घर लक्ष्मी का वास स्थिर रहता है। शुक्र ग्रह की शांति तथा वैवाहिक सुख के लिए भी शुक्रवार व्रत का विधान परंपरा में मान्य है। व्रती स्त्रियाँ मेहंदी, कुमकुम तथा चूड़ियाँ अर्पित करके देवी को संतुष्ट करती हैं।
सामान्य प्रश्न
धन-लक्ष्मी की प्राप्ति, गृह-सुख, शुक्र-दोष शांति एवं ऐश्वर्य।
