
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
वाल्मीकि रामायण के बालकांड के अनुसार अयोध्या के रघुवंशी सम्राट दशरथ थे, धर्म-परायण, प्रजा-पालक एवं बड़े प्रतापी। परंतु उनकी अंतरंग व्यथा यह थी कि उनकी संतान न थी। उनकी तीन पत्नियाँ थीं, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा। संतान-सुख की प्राप्ति हेतु राजा ने ऋषि श्रंगी के निर्देशन में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न किया, अंत्येष्टि-विधि-पूर्ण यज्ञ के उपरांत यज्ञ-पुरुष ने स्वयं दिव्य पायस (खीर) का पात्र प्रकट किया तथा निर्देश दिया कि राजा इसे अपनी पत्नियों में विभाजित कर दें।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
वाल्मीकि रामायण के बालकांड के अनुसार अयोध्या के रघुवंशी सम्राट दशरथ थे, धर्म-परायण, प्रजा-पालक एवं बड़े प्रतापी। परंतु उनकी अंतरंग व्यथा यह थी कि उनकी संतान न थी। उनकी तीन पत्नियाँ थीं, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा। संतान-सुख की प्राप्ति हेतु राजा ने ऋषि श्रंगी के निर्देशन में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न किया, अंत्येष्टि-विधि-पूर्ण यज्ञ के उपरांत यज्ञ-पुरुष ने स्वयं दिव्य पायस (खीर) का पात्र प्रकट किया तथा निर्देश दिया कि राजा इसे अपनी पत्नियों में विभाजित कर दें।
दशरथ ने पायस का आधा अंश कौशल्या को दिया; कैकेयी को चौथाई सुमित्रा को दिया; शेष चौथाई पुनः सुमित्रा को मिला (वाल्मीकि-परंपरा के अनुसार यह विभाजन स्वप्न-आदेश से हुआ)। पायस-ग्रहण के उपरांत ऋतु-संभव गर्भधारण हुआ। चैत्र शुक्ल नवमी की दिन तिथि में पुनर्वसु-नक्षत्र एवं त्रिकोण-लग्न में चारों ऋतुओं की सामग्री आयोजित अवस्था में यह जन्म हुआ। कौशल्या के गर्भ से श्रीराम का जन्म हुआ, धरती-व्यापी आनंद की स्मृति बनी; कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न उत्पन्न हुए।
श्रीराम के जन्म-समय अयोध्या में मंगल-ध्वनि गूंजी, देवताओं ने पुष्प-वर्षा की तथा नगर वासियों ने उत्सव मनाया। बालक के जन्म का नामकरण-संस्कार वशिष्ठ आदि के आचार्य के निर्देशन में हुआ, वशिष्ठ ने ज्येष्ठ कुमार का नाम 'राम' रखा। नाम का अर्थ विद्वानों ने यह बताया कि जो जगत् के भीतर रमण कराते हैं, आनंद के मूल स्रोत, वही राम-तत्त्व है।
बालक राम के बाल-जीवन का वर्णन रामायण में वात्सल्य-भरा है, दशरथ की चारों संतानों का पालन-पोषण राज-वैभव में हुआ। विश्वामित्र के आगमन से राम-लक्ष्मण के वन-यात्रा-प्रसंग आरंभ हुए, ताड़का-वध, मारीच-वध, अहल्या-उद्धार तथा मिथिला-यात्रा में जनक-सभा में शिव-धनुष-भंग से सीता-परिणय संपन्न हुआ। कथा आगे राम-रावण युद्ध तक विस्तृत है, जीवन के समस्त पर्वों में राम ने मर्यादा-पुरुषोत्तम का आदर्श स्थापित किया।
राम-जन्म की स्मृति में चैत्र शुक्ल नवमी पर रामनवमी मनाई जाती है, राम-जन्मोत्सव की घड़ी (मध्याह्न काल) में राम-जन्म का अभिषेक-पूजन किया जाता है, रामायण-पाठ होता है तथा प्रसाद बँटता है। भक्तों का विश्वास है कि राम-नवमी के व्रत-पाठ से घर में सुख-शांति, संतान-कल्याण एवं मर्यादा का वातावरण बना रहता है। राम-नाम का स्मरण सर्व-पाप-नाशक तथा सर्व-मंगल-दायक माना गया है, यही इस कथा-परंपरा का अंतिम संदेश है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
