
देवता
माँ लक्ष्मी एवं चंद्र देव
तिथि / समय
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा में कथा है कि एक व्यापारी की सुशीला नाम की पुत्री ने लक्ष्मी-पूजा में आलस्य किया था, जिससे उसे लक्ष्मी की कृपा फिर से अर्जित करनी पड़ी थी। लोक-कथा इस प्रकार है, एक व्यापारी की दो पुत्र-वधूएँ थीं, जिनमें एक धर्म-निष्ठ तथा दूसरी आलस्य-प्रिय थी। शरद पूर्णिमा की रात्रि लक्ष्मी-पूजा में आलस्य-प्रिय वधू सो गई। लक्ष्मी जी ने उसके दुःस्वप्न एवं दारिद्र्य से उसे झकझोरा। वह जागी तथा उसने पूजा आरंभ की, तब लक्ष्मी प्रसन्न हुईं तथा उसके घर की समृद्धि पुनः लौट आई।
व्रत विधि
कैसे रखें
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पूर्णिमा की रात्रि में लक्ष्मी पूजा करें, दीप-प्रज्वलन करें तथा जागरण एवं भजन कीर्तन करें। 'को जागर्ति' (कौन जाग रहा है) कहकर भ्रमण करने वाली परंपरा इसी से जुड़ी है, रात्रि भर जागने वालों को लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। चंद्रमा की कोमल किरणों में खीर रखने तथा प्रातः उसका प्रसाद बाँटने का विशेष विधान है। चंद्र को अर्घ्य दें। दूध-दही का भोग लगाएँ। रात्रि भर द्वार खुला रखने की परंपरा (लक्ष्मी आगमन) क्षेत्रीय रूप से है।
पूजा सामग्री
- दीप
- खीर (चंद्र-किरण-छुआ हुआ)
- लक्ष्मी चित्र
- फूल-प्रसाद
- चंदन
- दूध
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
धन-धान्य की प्राप्ति, स्वास्थ्य-रक्षा (खीर-प्रसाद), लक्ष्मी-कृपा।
व्रत कथा
परंपरा में कथा है कि एक व्यापारी की सुशीला नाम की पुत्री ने लक्ष्मी-पूजा में आलस्य किया था, जिससे उसे लक्ष्मी की कृपा फिर से अर्जित करनी पड़ी थी। लोक-कथा इस प्रकार है, एक व्यापारी की दो पुत्र-वधूएँ थीं, जिनमें एक धर्म-निष्ठ तथा दूसरी आलस्य-प्रिय थी। शरद पूर्णिमा की रात्रि लक्ष्मी-पूजा में आलस्य-प्रिय वधू सो गई। लक्ष्मी जी ने उसके दुःस्वप्न एवं दारिद्र्य से उसे झकझोरा। वह जागी तथा उसने पूजा आरंभ की, तब लक्ष्मी प्रसन्न हुईं तथा उसके घर की समृद्धि पुनः लौट आई।
दूसरी परंपरा में यह कथा है कि महालक्ष्मी स्वयं इस रात्रि भ्रमण करती हैं और पूछती हैं, 'को जागर्ति?' (कौन जाग रहा है?)। जो व्यक्ति जागकर देवी का स्मरण करता है, उसे धन-धान्य का आशीर्वाद मिलता है। स्कंद पुराण-परंपरा में इस रात्रि लक्ष्मी की विशेष आराधना का विधान है। रात्रि भर जागरण एवं दीप-दान से अनेक जन्मों के संचित दुःखों का नाश होता है, यह विश्वास प्रचलित रहा।
शरद पूर्णिमा का चंद्र सबसे स्वच्छ एवं कोमल किरणों वाला माना गया है। परंपरा में इस रात्रि चंद्र की किरणों में खीर रखने का विज्ञान-सम्मत भाव जुड़ा है, कोमल किरणों के संपर्क से खीर शीतल एवं सात्विक गुण से संपन्न मानी जाती है। इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने से वर्ष भर स्वास्थ्य सुधरता है, ऐसा लोक-विश्वास है।
व्रत का निष्कर्ष यह है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि-जागरण एवं लक्ष्मी-उपासना से धन-वैभव की अक्षयता होती है। जो गृहस्थ इस रात्रि विधिपूर्वक जागते हैं, उनके घर लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा समृद्धि बनी रहती है। यह पर्व धन-दान एवं धर्म-पालन की शुभ स्मृति ताज़ा करता है।
सामान्य प्रश्न
धन-धान्य की प्राप्ति, स्वास्थ्य-रक्षा (खीर-प्रसाद), लक्ष्मी-कृपा।
