Shanivar Vrat

शनिवार व्रत

शनि माहात्म्य की प्रसिद्ध कथा में राजा विक्रमादित्य की शनि-दशा एवं उनके धैर्यपूर्ण व्रत-पालन का वर्णन आता है। स्कंद पुराण की शनि-माहात्म्य परंपरा के अनुसार शनि …

शनिवार व्रत व्रत

देवता

शनि देव एवं श्री हनुमान जी

तिथि / समय

प्रत्येक शनिवार; शनि-अमावस्या एवं शनि-जयंती विशेष

श्रेणी

Shanivar व्रत

व्रत का परिचय

शनि माहात्म्य की प्रसिद्ध कथा में राजा विक्रमादित्य की शनि-दशा एवं उनके धैर्यपूर्ण व्रत-पालन का वर्णन आता है। स्कंद पुराण की शनि-माहात्म्य परंपरा के अनुसार शनि देव जिस कुंडली में दशा देते हैं, वहाँ सुख एवं वैभव की चिरस्थायी उन्नति के बीच परीक्षा का वातावरण बन जाता है।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल एवं लोहे का अर्पण करें। पीपल वृक्ष की पूजा कर उस पर जल अर्पित करें तथा तेल का दीप जलाएँ। काले उड़द, काले तिल एवं लोहे का दान करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। काले वस्त्र का प्रयोग करें तथा एक समय सात्विक भोजन करें। शनिवार को दान का महात्म्म विशेष है, विशेषकर भूखे-प्यासे को जल एवं निधन को अन्न देना शुभ फलदायी माना गया है।

पूजा सामग्री

  • सरसों का तेल
  • काले तिल
  • लोहा
  • काला उड़द
  • पीपल-पत्र
  • काला वस्त्र

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

शनि-दशा की पीड़ा से रक्षा, दुःख में धैर्य, दान का बल एवं ग्रह-शांति।

व्रत कथा

शनि माहात्म्य की प्रसिद्ध कथा में राजा विक्रमादित्य की शनि-दशा एवं उनके धैर्यपूर्ण व्रत-पालन का वर्णन आता है। स्कंद पुराण की शनि-माहात्म्य परंपरा के अनुसार शनि देव जिस कुंडली में दशा देते हैं, वहाँ सुख एवं वैभव की चिरस्थायी उन्नति के बीच परीक्षा का वातावरण बन जाता है।

कथा है कि उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य अपने गुणों से प्रसिद्ध थे। उन्होंने नवग्रहों की उपासना कराते समय शनि देव को अर्घ्य देने में उदासीनता दिखाई, उनका अभिमान था कि उनके राज्य में शनि की दशा असर नहीं कर सकती। शनि देव ने विनम्रता से कहा, 'राजन, दशा-प्रभाव मेरा धर्म है; कृपा-करुणा भी मेरा धर्म है। एक बार मेरी दृष्टि तुम पर डालने दो।' विक्रमादित्य ने इसे शनि की चुनौती समझकर अपने निर्णय पर अडिग रहे।

कुछ ही समय में राजा की परिस्थिति बदल गई। राज-काज में अड़चनें, मित्रों का विश्वास-घात तथा दुर्भाग्य की परंपरा एक-एक करके आई, और परिणाम यह हुआ कि एक दिन राजा अपने ही नगर से निर्वासित-सा होकर वन की ओर निकल गया। मार्ग में थकान से उन्होंने एक शिला पर विश्राम किया जो वास्तव में शनि देव का प्रभाव-क्षेत्र था। वहीं एक ग्राम में आश्रय लेकर उन्होंने धैर्य एवं उपासना का जीवन अपनाया। नगर की व्यथा सुनकर भी उन्होंने क्रोध नहीं किया; निर्धनों की सहायता करते रहे, शनिवार व्रत का नियम अपनाया तथा पीपल-पूजा एवं तेल-दीप का विधान किया।

साढ़े सात वर्षों की इस परीक्षा के उपरांत एक शनिवार की रात्रि स्वप्न में शनि देव प्रकट हुए और उन्होंने कहा, 'राजन, तूने धैर्य एवं व्रत से मेरी दशा का सम्मान किया। जो पुरुष दुःख में विनम्र रहता है, वही शनि की कृपा का पात्र बनता है। लौट जा, तेरा राज्य पुनः तुझे मिलेगा।' विक्रमादित्य पुनः उज्जयिनी लौटे, राज्य-काज सुचारु हुआ तथा उन्होंने आजीवन शनि-देव की उपासना एवं दान-धर्म का महत्त्व स्थापित किया। कथा का उपदेश है कि शनिवार व्रत एवं दान से शनि-दशा की पीड़ा शांत होती है तथा धैर्य का मूल्य अमूल्य बन जाता है।

सामान्य प्रश्न

शनि-दशा की पीड़ा से रक्षा, दुःख में धैर्य, दान का बल एवं ग्रह-शांति।

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