
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
महाभारत के वन-पर्व में मार्कंडेय ऋषि ने युधिष्ठिर को सावित्री की कथा सुनाई थी, कथा है कि अश्वपति नाम के राजा के कोई संतान न थी। उन्होंने सावित्री देवी की आराधना से वर्षों तक तप किया। प्रसन्न होकर देवी ने वरदान दिया कि उन्हें कन्या-रत्न प्राप्त होगी। कालांतर में रानी मालवी के गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा, देवी की कृपा का स्मृति-चिह्न। सावित्री इतनी तेजस्विणी बनी कि उसके तेज के सामने लोग टिक नहीं पाते थे।
व्रत विधि
कैसे रखें
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पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
महाभारत के वन-पर्व में मार्कंडेय ऋषि ने युधिष्ठिर को सावित्री की कथा सुनाई थी, कथा है कि अश्वपति नाम के राजा के कोई संतान न थी। उन्होंने सावित्री देवी की आराधना से वर्षों तक तप किया। प्रसन्न होकर देवी ने वरदान दिया कि उन्हें कन्या-रत्न प्राप्त होगी। कालांतर में रानी मालवी के गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा, देवी की कृपा का स्मृति-चिह्न। सावित्री इतनी तेजस्विणी बनी कि उसके तेज के सामने लोग टिक नहीं पाते थे।
जब सावित्री विवाह-योग्य हुई, तो राजा को उसके लिए वर खोजने में कठिनाई हुई। सावित्री ने स्वयं नारद जी के कहने पर वन में तपस्वियों के आश्रम गई। वहाँ उसने निर्वासित राजा द्युमत्सेन के अंधे पुत्र सत्यवान को देखा, सत्यवान गुणवान, सत्य-निष्ठ तथा रूपवान था। सावित्री ने उसी को अपना वर चुन लिया। नारद जी ने चेताया कि सत्यवान की आयु ठीक एक वर्ष बाद समाप्त होगी, परंतु सावित्री ने कहा, 'मन एक बार निश्चित हो चुका है; मैं धैर्य धारण करूँगी।'
विवाह हुआ। सावित्री ने वन में सास-ससुर की सेवा अपनाई, तपोमय जीवन बिताया तथा नियत दिन की गिनती चुपचाप रखी। नियत दिन आया, सत्यवान लकड़ियाँ काटने वन गया, सावित्री भी साथ गई। दोपहर में सत्यवान के सिर में पीड़ा उठी तथा वह पत्नी की गोद में शिथिल पड़ गया। उसी क्षण यमराज अपने भैंसे पर आए तथा सत्यवान के प्राणों का पाश खींचकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।
सावित्री उठी और उनके पीछे चल पड़ी। यमराज ने बार-बार लौट जाने को कहा, परंतु सावित्री की वाणी में धर्म-संबंधी गंभीर संवाद बरकरार रहे। उसके पतिव्रत के तेज से प्रसन्न होकर यमराज ने वर माँगने को कहा। सावित्री ने पहले ससुर की दृष्टि, फिर उनका राज्य, फिर पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने तीनों वर दिए। जब वे आगे बढ़ने लगे, सावित्री पुनः साथ-साथ चलती रही। चतुर्थ वर में उसने अपने लिए सौ पुत्रों की कामना की। यमराज ने बिना विचारे वर दे दिया। तब सावित्री ने कहा, 'आपने मुझे सौ पुत्र दिए, परंतु मेरे पति के बिना पुत्र की प्राप्ति असंभव है, आपका वर सत्य रहे तो मेरे पति को जीवित करें।'
यमराज का वचन बंध गया। उन्होंने सावित्री की बुद्धि एवं स्त्रीधर्म की सराहना करते हुए सत्यवान के शरीर में प्राण प्रतिष्ठित किए। सत्यवान जागा, द्युमत्सेन को दृष्टि लौट आई, राज्य मिला तथा अश्वपति को पुत्र हुए। सावित्री के धैर्य, निष्ठा एवं बुद्धि की यह कथा पतिव्रत-धर्म का शाश्वत प्रतीक बन गई। वट-वृक्ष के नीचे यह प्रसंग जुड़ा मानकर स्त्रियाँ वट सावित्री व्रत में वट की पूजा करती हैं तथा सावित्री जैसी निष्ठा का संकल्प लेती हैं।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
