
देवता
श्री सत्यनारायण (विष्णु का सत्य-स्वरूप)
तिथि / समय
परंपरागत रूप से पूर्णिमा; संकल्प अनुसार कोई भी शुभ तिथि (एकादशी, चतुर्थी आदि)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
स्कंद पुराण के रेवा खंड में यह कथा है, भगवान विष्णु ने सत्य-स्वरूप धारण करके बताया कि सत्य के स्मरण मात्र से संकट टलता है तथा जो सत्य-प्रतिज्ञा के साथ यह व्रत करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। पोथी-परंपरा में इस व्रत से जुड़ी पाँच कथाएँ प्रसिद्ध हैं, जिनमें व्रत के उपेक्षित-पालन तथा प्रतिज्ञा-भंग के परिणाम वर्णित हैं।
व्रत विधि
कैसे रखें
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संकल्प के बाद घर के शुद्ध स्थान पर चौकी/मंच बनाकर सत्यनारायण की स्थापना (यंत्र/चित्र) करें। षोडशोपचार पूजन करें। पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएँ। शेक (सूजी/गेहूँ की खीर) का विशेष भोग लगाएँ तथा पाँच फल अर्पित करें। सत्यनारायण कथा का वाचन करें, पोथी में पाँच अध्यायों की कथाएँ हैं, जिनका क्रम से श्रवण कराया जाता है। चरणामृत बाँटें। ब्राह्मण-भोजन एवं दक्षिणा-दान कर व्रत का उद्यापन करें। कथा-श्रवण के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
पूजा सामग्री
- सत्यनारायण चित्र/प्रतिमा
- पंचामृत
- शेक/खीर (सूजी/गेहूँ-चीनी-दूध-घी)
- पाँच फल
- कथा-पोथी
- कलश
- नारियल
- सुपारी
- तुलसी
- गंगाजल
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
मनोकामना-सिद्धि, धन-स्थिरता, बाधा-निवारण एवं सत्य-बल की प्राप्ति।
व्रत कथा
स्कंद पुराण के रेवा खंड में यह कथा है, भगवान विष्णु ने सत्य-स्वरूप धारण करके बताया कि सत्य के स्मरण मात्र से संकट टलता है तथा जो सत्य-प्रतिज्ञा के साथ यह व्रत करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। पोथी-परंपरा में इस व्रत से जुड़ी पाँच कथाएँ प्रसिद्ध हैं, जिनमें व्रत के उपेक्षित-पालन तथा प्रतिज्ञा-भंग के परिणाम वर्णित हैं।
प्रथम कथा, एक निर्धन ब्राह्मण की भक्ति से सत्यदेव प्रसन्न हुए और उसे धन-संपत्ति दी; परंतु ब्राह्मण ने कालांतर में व्रत-निष्ठा एवं दान-त्याग कर दिया, जिससे संपत्ति क्षीण हो गई। दूसरी कथा, एक साधु-वणिक (लकड़ी बेचने वाला गरीब) ने सत्यदेव का व्रत किया; उसकी वाणी से राजा उल्कामुख के राज्य में भी व्रत का प्रचार हुआ। तीसरी कथा, एक वणिक सदानंद की पत्नी ने व्रत-पूजा का उपहास किया तथा प्रतिज्ञा भंग की, जिससे व्रत-पालन के प्रसंग में उसे तीव्र संकट झेलना पड़ा; क्षमा-व्रत से पुनः सुख लौटा। चौथी कथा, एक बूढ़ी स्त्री की कन्या को व्रत का विधान ज्ञात हुआ तथा उसके पति का जहाज़ (व्यापार-यात्रा) संकट से रक्षा होकर लौटा। पाँचवीं कथा, एक राजा को व्रत के दर्शन एवं अपने पालन की प्रेरणा से राज-दरबार में सत्य-धर्म की स्थापना हुई।
रेवा खंड की परंपरा में साधु-वणिक की कथा विशेष प्रचलित है, कथा है कि एक गरीब काष्ठ-वणिक (लकड़हारा) वन से लकड़ियाँ काटकर नगर में बेचता था। एक दिन व्यापार-पथ में उसे कुछ साधुजन दिखे जो सत्यदेव की उपासना में संलग्न थे। उनके आशीर्वाद से वणिक को व्रत का विधान मिला। उसने विधिपूर्वक व्रत-पूजा की, कथा-श्रवण का आयोजन किया तथा उसी दिन उसकी लकड़ियाँ सोने में परिवर्तित-सा उचित मूल्य पाकर बिक गईं। कालांतर में वह धनी बना तथा उसके घर सत्य-व्रत की परंपरा चल पड़ी।
पोथी-परंपरा में मुख्य निष्कर्ष यही है कि सत्यनारायण व्रत में (1) संकल्प का सत्य-बल, (2) पूर्ण कथा-श्रवण तथा (3) प्रसाद-भोग (शेक/खीर) का विधान आवश्यक है। जो गृहस्थ विधि एवं श्रद्धा के साथ व्रत करता है, उसके घर लक्ष्मी स्थिर रहती है। बाधा-विघ्न होने पर सत्यदेव स्मरण से मार्ग खुलता है। विवाह, गृह-प्रवेश, संतान-प्राप्ति, व्यापार-सफलता, प्रत्येक शुभ अवसर पर यह पूजा की जाती है। कथा-वाचन के समय सभी उपस्थित लोगों को प्रसाद मिलता है, यह सामूहिक सत्य-स्मरण का अनुष्ठान है।
सामान्य प्रश्न
मनोकामना-सिद्धि, धन-स्थिरता, बाधा-निवारण एवं सत्य-बल की प्राप्ति।
