
देवता
भगवान विष्णु
तिथि / समय
पौष कृष्ण एकादशी
श्रेणी
Ekadashi व्रत
व्रत का परिचय
सफला एकादशी की कथा लुम्पक नाम के चोर से जुड़ी है। कथा है कि एक नगर में ब्राह्मण की पुत्री के दो पुत्र थे, बड़ा धर्म-निष्ठ तथा छोटा लुम्पक, जो पाप-प्रवृत्तियों में लिप्त चोर था। पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई ने पिता की संपत्ति सँभाली तथा लुम्पक को उसके दुराचरण के कारण घर से निकाल दिया। लुम्पक नगर के बाहर एक मंदिर-निकट स्थान में रहने लगा तथा चोरी से अपना निर्वाह करने लगा।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
व्रत-सफलता, लुम्पक चोर की कथा-परंपरा
व्रत कथा
सफला एकादशी की कथा लुम्पक नाम के चोर से जुड़ी है। कथा है कि एक नगर में ब्राह्मण की पुत्री के दो पुत्र थे, बड़ा धर्म-निष्ठ तथा छोटा लुम्पक, जो पाप-प्रवृत्तियों में लिप्त चोर था। पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई ने पिता की संपत्ति सँभाली तथा लुम्पक को उसके दुराचरण के कारण घर से निकाल दिया। लुम्पक नगर के बाहर एक मंदिर-निकट स्थान में रहने लगा तथा चोरी से अपना निर्वाह करने लगा।
पौष कृष्ण एकादशी की रात्रि ठंड अधिक थी। दिन भर भूखा लुम्पक मंदिर के पास बैठा रहा। रात्रि के पहरे में वह ठंड से तड़पने लगा। मंदिर में दीप जल रहा था तथा विष्णु की प्रतिमा के समक्ष देव-प्रसाद रूप फल-मिठाई रखी थी। भोजन-प्रसाद में रखी वस्तु देव-स्वामी की समझकर लुम्पक ने उसे उठाया नहीं, यही उसकी देव-श्रद्धा की पहली किरण थी। प्रातः उसने प्रसाद लिया तथा पूरा दिन-रात अनाहार व्यतीत किया। उसी रात्रि उसका संकल्प-साधना से एकादशी-पुण्य हो गया।
कालांतर में लुम्पक की वृत्ति बदल गई। उसके एकादशी-साधना के प्रभाव से उसके शरीर का तेज एवं चित्त की शुद्धि बनी। देव-दूतों ने उसे विष्णु की कृपा का दर्शन कराया तथा वह अपने गति-परिवर्तन से मुक्त होकर उत्तम जीवन पाया। सफला एकादशी का यही निष्कर्ष है कि दुर्जन भी इस एकादशी के साधन-संयोग से पाप-बंधन से मुक्त हो जाता है। यह एकादशी व्रती के समस्त कार्य सफल कराने वाली मानी गई है, जीवन की दिशा बदलने की यह तिथि परंपरा में अद्भुत महत्त्व रखती है।
सामान्य प्रश्न
व्रत-सफलता, लुम्पक चोर की कथा-परंपरा
