Aur Vrat Vrat

समुद्र-मंथन की विस्तृत कथा

भागवत पुराण, विष्णु पुराण एवं महाभारत में समुद्र-मंथन की कथा वर्णित है, कथा है कि एक बार देवता बल-हीन हो गए तथा उनकी दशा दैत्यों के प्रभाव से बिगड़ने लगी। देवता…

समुद्र-मंथन की विस्तृत कथा व्रत

देवता

तिथि / समय

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

भागवत पुराण, विष्णु पुराण एवं महाभारत में समुद्र-मंथन की कथा वर्णित है, कथा है कि एक बार देवता बल-हीन हो गए तथा उनकी दशा दैत्यों के प्रभाव से बिगड़ने लगी। देवताओं की योग्यता एवं पराक्रम का अंतर अमृत से नष्ट हो सकता था, अमृत-पान से अमरता की प्राप्ति संभव थी। क्षीरसागर में विद्यमान अमृत को प्राप्त करने के लिए समुद्र-मंथन का विचार आया, परंतु देवताओं के बल से यह असंभव-सा प्रतीत हुआ।

व्रत विधि

कैसे रखें

  1. 1

पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    भागवत पुराण, विष्णु पुराण एवं महाभारत में समुद्र-मंथन की कथा वर्णित है, कथा है कि एक बार देवता बल-हीन हो गए तथा उनकी दशा दैत्यों के प्रभाव से बिगड़ने लगी। देवताओं की योग्यता एवं पराक्रम का अंतर अमृत से नष्ट हो सकता था, अमृत-पान से अमरता की प्राप्ति संभव थी। क्षीरसागर में विद्यमान अमृत को प्राप्त करने के लिए समुद्र-मंथन का विचार आया, परंतु देवताओं के बल से यह असंभव-सा प्रतीत हुआ।

    विष्णु की सलाह से देवताओं ने दैत्यों के साथ अस्थायी सहयोग का संधि-विचार किया, अमृत के समान विभाजन का वचन देकर उन्हें मंथन में सहयोगी बनाया। मंदराचल पर्वत को मथनी (चुर्णी) बनाया गया तथा वासुकि नाग को रस्सी की भाँति पर्वत पर लपेटा गया। देवताओं ने एवं दैत्यों ने वासुकि के दोनों सिरों को पकड़कर खींचना आरंभ किया। मेरु-समीप से पर्वत डूबने लगा, तब विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार धारण करके पर्वत को अपनी पीठ पर स्थिर किया।

    मंथन आरंभ हुआ। सर्वप्रथम हलाहल, भयंकर विष, प्रकट हुआ, जिसकी विष-ज्वाला से त्रिलोक दग्ध होने लगा। समस्त सृष्टि-भीत भागी। उस समय शिव ने अपनी करुणा से हलाहल को अपने कंठ में पी लिया, विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, इसी से उन्हें 'नीलकंठ' कहा गया। निःसृत विष-शेष नाग-कुल ने ग्रहण किया।

    इसके उपरांत मंथन से उत्तम वस्तुएँ एक-एक करके निकलीं, कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा सात-मुख अश्व, ऐरावत सफेद हाथी, कौस्तुभ-पुष्प जगत् का चौदह रत्न मंथन से प्राप्त हुए; लक्ष्मी प्रकट हुईं तथा उन्होंने विष्णु को वरण किया; चंद्रमा निकला तथा शिव के मस्तक पर विराजमान हुआ; वारुणी देवी प्रकट हुईं; अंत में धन्वंतरि स्वयं अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए।

    अमृत-कलश देखते ही दैत्यों ने उसे छीन लिया। देवताओं की व्यथा का समाधान करने विष्णु ने मोहिनी, अद्भुत सुंदरी, का रूप धारण किया तथा दैत्यों को वितरण-व्यवस्था का भार देने को कहा। मोहिनी ने देवताओं को पहले अमृत पिलाना आरंभ किया, दैत्य मोह-वश वितरण देखते रह गए। एक दैत्य राहु ने देव-पंक्ति में छिपकर अमृत-पान किया; सूर्य-चंद्र ने उसे पहचानकर बताया, विष्णु ने सुदर्शन से उसका शिर काट दिया, परंतु अमृत-स्पर्श से शिर अमर हो गया, वही राहु-केतु बने तथा सूर्य-चंद्र का ग्रहण-पीड़ा का संबंध परंपरा से जुड़ा।

    समुद्र-मंथन का उपदेश अनेक स्तरों पर वर्णित है, सहयोग से असंभव कार्य संभव होते हैं; विष-पीकर भी कल्याण करने वाला शिव-तत्त्व रक्षक है; तथा माया के मोह में अधर्म अंततः वंचित रहता है। प्रत्येक रत्न का प्रतीकात्मक अर्थ देवताओं से जुड़ा, कामधेनु इच्छा-पूर्ति, लक्ष्मी समृद्धि, चंद्रमा शीतल-कांति तथा धन्वंतरि आयुर्वेद-तत्त्व के प्रतीक बने। कार्तिक-परंपरा एवं देव-परंपरा के अनेक पर्व इसी मंथन-स्मृति से जुड़े हैं, समुद्र-मंथन कथा का पाठ कल्याण-प्रद माना जाता है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

    इस व्रत की कथा Sanatan Seva ऐप में सुनें, मंत्र और आरती के साथ

    संबंधित सामग्री

    सभी व्रतों पर वापस जाएँ