
देवता
सप्तर्षि (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ) एवं अरुंधती
तिथि / समय
भाद्रपद शुक्ल पंचमी (गणेशोत्सव के चौथे दिन)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
कथा के अनुसार एक ब्राह्मण-दंपति (सुमेधा-कौशिक परंपरा) की पुत्रवधू ने सप्तर्षि की पूजा से शारीरिक-दोष एवं घोर दुःख से मुक्ति पाई थी। कथा इस प्रकार है, कौशिक नाम के ऋषि के आश्रम में सुमेधा नाम की उनकी पत्नी थी। उनके पुत्र की पत्नी (पुत्रवधू) ऋतु-दोष से ग्रस्त हो गई थी, इस दोष के कारण उसके शरीर पर रोग एवं दुर्गंध उत्पन्न हो गए तथा ऋतु-काल में वह स्वयं को अशुद्ध एवं दुखी मानने लगी। आश्रम के ऋतु-क्रम के कारण यह बात ऋषियों तक पहुँची।
व्रत विधि
कैसे रखें
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उपवास रखें। सप्तर्षि-अरुंधती की पूजा करें, सात ऋषियों के नाम-मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्पण करें। ऋषि पंचमी कथा का श्रवण करें। ब्राह्मण-दंपति को भोजन-दान करें तथा रात्रि पारण करें। इस दिन विशेष शुद्धि-भाव रखा जाता है, भोजन अपने हाथ से बनाने तथा ऋतु- शुद्धि के विधान का पालन करने की परंपरा है। गेरू से सप्तर्षि के चित्र बनाकर पूजा का आयोजन गृहस्थ स्त्रियाँ करती हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से गौरी-पूजा करने वाली स्त्रियाँ पंचमी को उसका समापन भी करती हैं।
पूजा सामग्री
- सप्तर्षि-चित्र (गेरू/राजमहल-शैली क्षेत्रीय)
- दान-सामग्री
- फूल-प्रसाद
- कथा-पोथी
- अपराजिता दूर्वा (परंपरा)
- अक्षत- चंदन
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
दोष-निवृत्ति, शरीर-मन की शुद्धि, ऋषि-कृपा एवं संतान-कल्याण।
व्रत कथा
कथा के अनुसार एक ब्राह्मण-दंपति (सुमेधा-कौशिक परंपरा) की पुत्रवधू ने सप्तर्षि की पूजा से शारीरिक-दोष एवं घोर दुःख से मुक्ति पाई थी। कथा इस प्रकार है, कौशिक नाम के ऋषि के आश्रम में सुमेधा नाम की उनकी पत्नी थी। उनके पुत्र की पत्नी (पुत्रवधू) ऋतु-दोष से ग्रस्त हो गई थी, इस दोष के कारण उसके शरीर पर रोग एवं दुर्गंध उत्पन्न हो गए तथा ऋतु-काल में वह स्वयं को अशुद्ध एवं दुखी मानने लगी। आश्रम के ऋतु-क्रम के कारण यह बात ऋषियों तक पहुँची।
सुमेधा ने देवर्षि नारद के संकेत से सप्तर्षियों की शरण ली। सप्तर्षियों ने कहा कि उनकी पूजा से ऋतु-दोष का नाश होता है। पुत्रवधू ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत रखा, स्नान-शुद्धि से सप्तर्षि एवं अरुंधती की पूजा की, ब्राह्मण-दंपति को भोजन-दान दिया तथा रात्रि-पारण किया। उसका दोष निवृत्त हुआ तथा उसका शरीर एवं मन दोनों निर्मल हो गए।
कथा का उपदेश यह है कि सप्तर्षि स्वयं की शक्ति के द्वारा मन-देह की शुद्धि का आशीर्वाद देते हैं। अरुंधती का नाम पतिव्रत-धर्म के साथ जुड़ा है, वह सप्तर्षि-मंडल में वसिष्ठ के साथ दिखाई देने वाली अल्प-प्रकाश की स्वरूपा है, जिसे देखकर विवाह-संस्कार में पति-पत्नी को प्रणाम कराने की परंपरा है।
व्रत का फल विशेष रूप से शुद्धि-प्राप्ति माना गया है, शरीर-मन की निर्मलता, ऋतु-शुद्धि एवं ऋषि-आशीर्वाद से संतान-कल्याण। जो स्त्री-पुरुष इस दिन विधिपूर्वक उपवास-पूजा करते हैं, उनके संचित दोषों का निराकरण होता है। भाद्रपद की पंचमी पर दान-पुण्य का विशेष महत्त्व भी है, अन्न-वस्त्र का दान करने वाले के गृह-सुख में वृद्धि होती है, यह लोक-विश्वास प्रचलित है।
सामान्य प्रश्न
दोष-निवृत्ति, शरीर-मन की शुद्धि, ऋषि-कृपा एवं संतान-कल्याण।
