
देवता
पावन सूत्र, श्रीकृष्ण-द्रौपदी, इंद्र-शची एवं यम-यमुना परंपरा
तिथि / समय
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा की कथाओं में इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध से पूर्व इंद्र की कलाई पर पावन सूत्र बाँधा था, जिससे उनकी विजय हुई थी। कथा इस प्रकार है, देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय होने लगी। इंद्र युद्ध के लिए निकल रहे थे। देवगुरु बृहस्पति ने रक्षा-सूत्र की विधि बताई तथा इंद्राणी शची ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार के साथ इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। इस रक्षा के प्रभाव से इंद्र ने दैत्यों पर विजय प्राप्त की और अमरावती की रक्षा हुई। यही रक्षा-सूत्र की परंपरा आगे चलकर रक्षा बंधन के रूप में विकसित हुई।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूर्णिमा के दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी (पावन सूत्र) बाँधती हैं, माथे पर तिलक करती हैं, मिठाई खिलाती हैं तथा आरती उटाती हैं; भाई उपहार देकर रक्षा का संकल्प करता है। राखी बाँधने से पूर्व दीप जलाकर राखी एवं तिलक-सामग्री का पूजन किया जाता है। राखी के साथ प्रायः नारियल या मिठाई भी रखी जाती है। बहन के निमंत्रण पर भाई बहन के घर जाकर राखी बँधवाता है। पंडित/गुरु की राखी (गुरु- राखी) भी बाँधने की परंपरा है।
पूजा सामग्री
- राखी (रांची/सूत्र)
- तिलक-सामग्री (रोली-चावल)
- मिठाई
- दीप-आरती थाली
- नारियल
- अमृत-घड़ी (क्षेत्रीय)
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
भाई की दीर्घायु एवं रक्षा, भाई-बहन का पावन बंधन, विजय-सिद्धि।
व्रत कथा
परंपरा की कथाओं में इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध से पूर्व इंद्र की कलाई पर पावन सूत्र बाँधा था, जिससे उनकी विजय हुई थी। कथा इस प्रकार है, देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय होने लगी। इंद्र युद्ध के लिए निकल रहे थे। देवगुरु बृहस्पति ने रक्षा-सूत्र की विधि बताई तथा इंद्राणी शची ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार के साथ इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। इस रक्षा के प्रभाव से इंद्र ने दैत्यों पर विजय प्राप्त की और अमरावती की रक्षा हुई। यही रक्षा-सूत्र की परंपरा आगे चलकर रक्षा बंधन के रूप में विकसित हुई।
दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग यम-यमुना का है, यमराज की बहन यमुना ने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधी। यमराज प्रसन्न होकर बहन को यह वरदान दिया कि जिस भाई की बहन राखी बाँधकर उसे यम-भय से मुक्त करेगी, उसे दीर्घायु प्राप्त होगी। इसी प्रसंग से राखी का संबंध भाई की दीर्घायु एवं रक्षा से जुड़ा माना गया।
तीसरा प्रसंग महाभारत से जुड़ा है, कृष्ण की छड़ी से शुद्धपाणि शक्ति ने सूर्य-वध की रक्षा करते समय अपनी अंगुली से धारा बहने लगी थी; उसी समय द्रौपदी ने अपने आँचल का सिरा चीरकर कृष्ण की अंगुली पर पट्टी बाँध दी थी। कृष्ण ने उसे ऋण-मुक्त करने का संकल्प लिया। परंपरा में यह प्रसंग रक्षा-सूत्र के पारस्परिक रक्षा-बंध का प्रतीक माना गया, बहन भाई की रक्षा करती है, भाई बहन की।
रक्षा बंधन का मूल भाव स्नेह-रक्षा का अक्षय बंधन है। भाई-बहन के पावन संबंध के अतिरिक्त गुरु-शिष्य, पंडित-यजमान तथा समाज के रक्षा-संबंधों में भी यह सूत्र जुड़ा। जो बहन विधिपूर्वक राखी बाँधती है, उसके भाई की आयु-रक्षा एवं विजय की कामना पूर्ण होती है, यह इस पर्व का आधार-विश्वास है। बलि प्रतिपदा से भी जुड़ी कथाएँ (बलि-वामन) इस तिथि की परंपराओं में क्षेत्रीय रूप से मिलती हैं।
सामान्य प्रश्न
भाई की दीर्घायु एवं रक्षा, भाई-बहन का पावन बंधन, विजय-सिद्धि।
